- ली़ड्स जेनेटिक्स में 40 से 60 लीटर दूध देने वाली अगली पीढ़ी तैयार करने का दावा
- अब जन्म से पहले तय होगी गाय की दुग्ध क्षमता
- 2027 तक 700 जीनोमिक बछड़ों का लक्ष्य
- हर माह 15 हजार भ्रूण उत्पादन की तैयारी
- बरेली। बरेली से देश की डेयरी अर्थव्यवस्था को नई आनुवंशिक दिशा
बीएल एग्रो के मैनेजिंग डायरेक्टर आशीष खंडेलवाल के नेतृत्व में लीड्स जेनेटिक्स का बड़ा प्रयोग, देसी नस्लों की आनुवंशिक श्रेष्ठता के साथ 40 से 60 लीटर दूध क्षमता वाली पीढ़ी तैयार करने का लक्ष्य
टेलीग्राम संवाद
बरेली। देश में डेयरी फार्मिंग को वैज्ञानिक और आनुवंशिक तकनीक से नई दिशा देने की पहल बरेली से आकार ले रही है। बीएल एग्रो के मैनेजिंग डायरेक्टर आशीष खंडेलवाल के नेतृत्व में लीड्स जेनेटिक्स के गौ सृष्टि परिसर में देसी नस्लों की आनुवंशिक क्षमता को संरक्षित रखते हुए उच्च दुग्ध उत्पादन वाली अगली पीढ़ी तैयार करने पर काम चल रहा है।फतेहगंज पश्चिमी स्थित करीब 200 बीघा क्षेत्र में फैले इस परिसर में गिर, साहीवाल, राठी और हरियाणवी जैसी देसी नस्लों की श्रेष्ठ आनुवंशिक क्षमता को जीनोमिक चयन, भ्रूण प्रत्यारोपण, ओपीयू-आईवीएफ और एमओईटी जैसी आधुनिक तकनीकों से आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
आशीष खंडेलवाल के अनुसार परियोजना का उद्देश्य केवल दूध उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसी वैज्ञानिक प्रजनन व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें पशु की आनुवंशिक क्षमता को जन्म के शुरुआती चरण में ही पहचाना जा सके और श्रेष्ठ पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ाई जा सके।लीड्स जेनेटिक्स में ब्राजील से उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले भ्रूण लाकर उनका भारतीय परिस्थितियों में प्रत्यारोपण किया गया है। शुरुआती चरण में करीब 65 से 67 प्रतिशत सफलता दर हासिल होने का दावा किया गया है। अब तक पांच बछड़ों के जन्म के साथ करीब 60 और बछड़ों के जन्म की प्रक्रिया चल रही है।परियोजना का अगला लक्ष्य और बड़ा है। करीब 400 और गायों में भ्रूण प्रत्यारोपण की योजना है और 2027 के मध्य तक समान उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले करीब 700 बछड़ों का समूह तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।इसके बाद श्रेष्ठ नर और मादा पशुओं से आनुवंशिक सामग्री लेकर बड़े पैमाने पर भ्रूण उत्पादन किया जाएगा। परियोजना के तहत 2027 के अंत तक करीब 15 हजार भ्रूण प्रतिमाह तैयार करने की क्षमता विकसित करने की योजना बताई गई है।
आशीष खंडेलवाल के नेतृत्व में चल रही इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष गौशालाओं को भी इससे जोड़ना है। उत्तर प्रदेश सरकार के साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत इस तकनीक को गौशालाओं तक पहुंचाने की दिशा में पहल की जा रही है। उद्देश्य यह है कि चयनित पशुओं के जरिए उच्च आनुवंशिक क्षमता वाली संतति तैयार की जा सके और अनुपयोगी समझे जाने वाले पशुधन को भी वैज्ञानिक प्रजनन कार्यक्रम से आर्थिक रूप से उपयोगी बनाया जा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार जीनोमिक परीक्षण के जरिए बछड़े के जन्म के बाद ही उसके आनुवंशिक संकेतकों की पहचान की जा सकती है। रक्त या बाल के नमूने से डीएनए निकालकर यह देखा जाता है कि उसमें दूध उत्पादन, रोग प्रतिरोध और अन्य उपयोगी गुणों से जुड़े कौन से आनुवंशिक संकेतक मौजूद हैं।
यह पहल भारतीय डेयरी क्षेत्र के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका फोकस विदेशी नस्लों पर निर्भरता बढ़ाने के बजाय देसी नस्लों की आनुवंशिक श्रेष्ठता को पहचानकर उसे वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से तेजी से आगे बढ़ाने पर है।
बीएल एग्रो और लीड्स जेनेटिक्स की यह पहल आने वाले वर्षों में पशुपालन, डेयरी उद्योग, आनुवंशिकी और कृषि अर्थव्यवस्था के बीच एक नए औद्योगिक मॉडल का आधार बन सकती है।

ब्राजील से आए भ्रूण, पहली खेप में 65-67 प्रतिशत सफलता
लीड्स जेनेटिक्स में पिछले करीब दो वर्षों से चल रहे अनुसंधान के तहत ब्राजील से उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले भ्रूण लाकर भारतीय परिस्थितियों में प्रत्यारोपित किए गए हैं। अब तक पांच बछड़ों के जन्म की जानकारी दी गई है, जबकि करीब 60 और बछड़ों के जन्म की प्रक्रिया चल रही है। संस्थान के मुताबिक पहले चरण में भ्रूण प्रत्यारोपण की सफलता दर करीब 65 से 67 प्रतिशत रही है।
करीब 160 गर्भवती गायों में से लगभग 60 के अगले 15 दिनों में और करीब 100 के नवंबर के पहले सप्ताह में बछड़े देने की संभावना बताई गई है। जैव-सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए गर्भवती पशुओं के लिए अलग और नियंत्रित परिसर भी बनाया गया है।
जन्म के तुरंत बाद जीनोमिक जांच से खुलेगा भविष्य
इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष जीनोमिक चयन है। विशेषज्ञों के अनुसार बछड़े के जन्म के तुरंत बाद रक्त या बाल के नमूने से डीएनए की जांच कर उसके अंदर मौजूद विशिष्ट आनुवंशिक संकेतकों का अध्ययन किया जा सकता है। इससे भविष्य में उसकी दुग्ध क्षमता, कुछ बीमारियों के प्रति प्रतिरोध और अन्य आनुवंशिक गुणों का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है।
लीड्स जेनेटिक्स की प्रयोगशाला में डीएनए अनुक्रमण मशीन और जीनोमिक परीक्षण की आधुनिक व्यवस्था स्थापित की गई है। नमूने की गुणवत्ता जांच के बाद डीएनए का अनुक्रमण किया जाता है और प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण कर उपयोगी आनुवंशिक संकेतकों की पहचान की जाती है।
60 दिन में 100 किलो वजन का लक्ष्य
परिसर में जन्म लेने वाले उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले बछड़ों के पालन के लिए भी विशेष प्रोटोकॉल अपनाया जा रहा है। बछड़ों को शुरुआती चरण में बोतल से दूध दिया जाता है। सुबह और शाम दो-दो लीटर दूध देने की व्यवस्था बताई गई है। नियमित वजन की निगरानी की जाती है और 60 दिन की उम्र में करीब 100 किलो वजन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार बछड़े के शुरुआती 90 दिन उसके भविष्य के विकास में महत्वपूर्ण होते हैं। पर्याप्त पोषण, नियंत्रित ऊर्जा खर्च और नियमित स्वास्थ्य निगरानी के जरिए विकास दर को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
2027 के मध्य तक 700 उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले बछड़े
लीड्स जेनेटिक्स ने अगले चरण के लिए करीब 400 और गायों में भ्रूण प्रत्यारोपण की योजना बनाई है। लक्ष्य है कि वर्ष 2027 के मध्य तक समान उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले करीब 700 बछड़ों का समूह तैयार हो जाए। इसके लिए करीब एक हजार पशुओं की क्षमता वाला नया शेड भी तैयार किया जा रहा है।
इन पशुओं के परिपक्व होने के बाद श्रेष्ठ मादा पशुओं से अंडाणु और श्रेष्ठ नर पशुओं से उच्च गुणवत्ता वाला वीर्य लेकर आगे की पीढ़ी तैयार करने की योजना है। इस तरह आनुवंशिक श्रेष्ठता को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक तेजी से पहुंचाने का मॉडल विकसित किया जा रहा है।
ओपीयू-आईवीएफ के साथ एमओईटी पर जोर
परिसर में दो प्रमुख प्रजनन तकनीकों पर काम किया जा रहा है—ओपीयू-आईवीएफ और एमओईटी। विशेषज्ञों के अनुसार ओपीयू तकनीक में अंडाशय से अंडाणु लेकर प्रयोगशाला में निषेचन के माध्यम से भ्रूण तैयार किया जाता है, जबकि एमओईटी यानी बहु-अंडोत्सर्जन एवं भ्रूण प्रत्यारोपण में हार्मोनल प्रोटोकॉल के जरिए एक पशु से सामान्य से कहीं अधिक अंडाणु प्राप्त कर उनसे भ्रूण तैयार किए जाते हैं।
एमओईटी में श्रेष्ठ गाय का चयन उसके दूध उत्पादन, नस्लीय विशेषताओं और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर किया जाता है। इसके बाद हार्मोनल प्रक्रिया से कई अंडाणुओं का विकास कराया जाता है। कृत्रिम गर्भाधान के बाद सातवें दिन भ्रूण निकालकर दूसरी गाय में प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक प्रक्रिया में एक गर्भावस्था से सामान्यतः एक बछड़ा मिलता है, जबकि एमओईटी के जरिए श्रेष्ठ आनुवंशिक क्षमता वाली एक गाय से एक ही प्रजनन चक्र में कई भ्रूण प्राप्त किए जा सकते हैं। हालांकि पशु के स्वास्थ्य और प्राकृतिक चक्र को ध्यान में रखते हुए प्रक्रियाओं के बीच उचित अंतर रखा जाता है।

14 साल की गाय से भी तैयार किए गए भ्रूण
परिसर में 14 वर्ष की गाय से भी भ्रूण तैयार करने का उदाहरण सामने आया है। विशेषज्ञों के अनुसार इस गाय से नौ बछड़ों की आनुवंशिक श्रृंखला तैयार की गई। इससे यह संकेत मिलता है कि अच्छी आनुवंशिक क्षमता वाली पशु संपदा को अधिक समय तक प्रजनन कार्यक्रम में उपयोगी बनाए रखने की संभावनाएं मौजूद हैं।
सालाना नहीं, हर माह 15 हजार भ्रूण उत्पादन की तैयारी
परियोजना का सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य वर्ष 2027 के अंत तक करीब 15 हजार भ्रूण प्रतिमाह तैयार करने की क्षमता विकसित करना है। यदि यह लक्ष्य हासिल होता है तो उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर भ्रूण प्रत्यारोपण संभव होगा।
इसका सीधा संबंध देश की डेयरी अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। कम दूध देने वाले पशुओं के पालन की लागत और किसानों पर बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच उच्च उत्पादकता वाले पशुओं की आनुवंशिक आबादी तैयार करना डेयरी क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
गौशालाओं तक पहुंचाने की तैयारी, सरकार के साथ पीपीपी मॉडल
इस तकनीक को गौशालाओं तक पहुंचाने की दिशा में भी पहल शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश सरकार के साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर समझौते की तैयारी की जानकारी दी गई है। परियोजना से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बड़ी संख्या में भ्रूण उपलब्ध होते हैं तो गौशालाओं में मौजूद चयनित पशुओं को भी उच्च आनुवंशिक क्षमता वाली संतति तैयार करने के कार्यक्रम से जोड़ा जा सकता है।
सरकारी स्तर पर बड़ी संख्या में भ्रूण की आवश्यकता को देखते हुए संस्थान ने अगले पांच वर्षों में सरकारी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है।
जुड़वां बछड़ों पर भी प्रयोग
परियोजना में एक और प्रयोग के तहत कुछ गायों में दो भ्रूण प्रत्यारोपित कर जुड़वां बछड़ों के जन्म की संभावना पर काम किया जा रहा है। संस्थान के अनुसार शुरुआती स्तर पर इसमें सफलता के संकेत मिले हैं। यदि यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी रूप से विकसित होती है तो उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं की संख्या बढ़ाने की गति और तेज हो सकती है।
असली बदलाव नस्ल बदलने में नहीं, श्रेष्ठ जीन चुनने में
विशेषज्ञों के मुताबिक इस पूरी तकनीक का आधार किसी नस्ल को बदलना नहीं बल्कि उपलब्ध आबादी में मौजूद श्रेष्ठ आनुवंशिक गुणों की पहचान कर उनका चयन और तेजी से प्रसार करना है।
जीनोमिक चयन में बड़ी पशु आबादी में से उन पशुओं की पहचान की जाती है जिनमें दूध उत्पादन, रोग प्रतिरोध और अन्य उपयोगी गुणों से जुड़े आनुवंशिक संकेतक बेहतर होते हैं। फिर उन्हीं पशुओं को अगली पीढ़ी के लिए प्राथमिकता दी जाती है।
ब्राजील में गिर नस्ल की दुग्ध क्षमता में हुई प्रगति का उदाहरण देते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि कई दशकों तक श्रेष्ठ पशुओं के चयन, कमजोर पशुओं को प्रजनन श्रृंखला से हटाने और आधुनिक आनुवंशिक तकनीकों के इस्तेमाल ने वहां उच्च उत्पादकता वाली आबादी विकसित करने में भूमिका निभाई।
डेयरी अर्थव्यवस्था के लिए नई संभावनाएं
लीड्स जेनेटिक्स का यह मॉडल केवल पशु प्रजनन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में डेयरी उत्पादकता, पशु आनुवंशिकी, वैज्ञानिक प्रजनन, प्रयोगशाला तकनीक और किसानों की आय को एक साथ जोड़ने की कोशिश है।
यदि जीनोमिक चयन, भ्रूण प्रत्यारोपण और उच्च गुणवत्ता वाले प्रजनन कार्यक्रम बड़े पैमाने पर सफल होते हैं तो आने वाले वर्षों में देश में कम समय में अधिक संख्या में उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले दुधारू पशु तैयार करने की क्षमता विकसित हो सकती है। इससे देसी नस्लों के संरक्षण के साथ-साथ दुग्ध उत्पादन और डेयरी कारोबार की आर्थिक क्षमता को भी नया आधार मिलने की उम्मीद है।

“देसी नस्लों की आनुवंशिक ताकत को दुनिया के सामने लाएंगे: आशीष खंडेलवाल
आशीष खंडेलवाल, मैनेजिंग डायरेक्टर, बीएल एग्रो ने कहा कि हमारा उद्देश्य केवल अधिक दूध देने वाली गाय तैयार करना नहीं है, बल्कि भारत की श्रेष्ठ देसी नस्लों की आनुवंशिक क्षमता को वैज्ञानिक तरीके से पहचानकर अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना है। गिर, साहीवाल, राठी और हरियाणवी जैसी नस्लों की अपनी विशिष्ट आनुवंशिक पहचान है और हम उसे बनाए रखते हुए उनकी उत्पादक क्षमता को बेहतर करने पर काम कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि जीनोमिक तकनीक ने पशुपालन के क्षेत्र में संभावनाओं का नया द्वार खोला है। बछड़े के जन्म के शुरुआती चरण में ही डीएनए परीक्षण के माध्यम से उसके अंदर मौजूद उपयोगी आनुवंशिक संकेतकों की पहचान की जा सकती है। इससे यह तय करने में मदद मिलती है कि किन पशुओं को आगे की प्रजनन प्रक्रिया में शामिल किया जाए।आशीष खंडेलवाल ने कहा कि लीड्स जेनेटिक्स में हमारा लक्ष्य उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ाना है। पहले चरण में हमें उत्साहजनक परिणाम मिले हैं और अब अगले चरण में करीब 400 और पशुओं पर काम शुरू किया जा रहा है। हमारा लक्ष्य 2027 के मध्य तक करीब 700 उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले बछड़ों का समूह तैयार करना और वर्ष के अंत तक बड़े पैमाने पर भ्रूण उत्पादन की क्षमता विकसित करना है।उन्होंने कहा कि इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ किसान और देश की डेयरी अर्थव्यवस्था को मिल सकता है। यदि कम पशुओं से अधिक गुणवत्तापूर्ण दूध उत्पादन संभव होता है तो पशुपालन की लागत, उत्पादकता और किसान की आय—तीनों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।आशीष खंडेलवाल ने कहा कि हम इस तकनीक को केवल अपने परिसर तक सीमित नहीं रखना चाहते। भविष्य में सरकार और गौशालाओं के साथ मिलकर इसे बड़े स्तर पर लागू करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। हमारा लक्ष्य ऐसी जेनेटिक डेयरी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें देसी नस्लों का संरक्षण भी हो और उनकी उत्पादक क्षमता का वैज्ञानिक विस्तार भी।













