दूध से खाद्य तेल तक… आरएलआरसी की हाईटेक लैब में खुलेगा मिलावट का सच

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टेलीग्राम संवाद

बरेली। रोजमर्रा की जिंदगी में दूध, पानी, खाद्य तेल, दाल, गेहूं, सब्जियां और अन्य खाद्य पदार्थ हमारी जरूरत का हिस्सा हैं। इनकी गुणवत्ता को लेकर अक्सर मिलावट की आशंका बनी रहती है। खासकर दूध और पानी में मिलावट को लेकर लोगों के बीच तरह-तरह की धारणाएं हैं। ऐसे में किसी खाद्य पदार्थ की वास्तविक गुणवत्ता जानने का सबसे विश्वसनीय तरीका वैज्ञानिक परीक्षण है। बरेली के परसाखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र स्थित रोहिलखंड लेबोरेटरी एंड रिसर्च सेंटर (आरएलआरसी) में आधुनिक तकनीक के जरिए खाद्य एवं पेय पदार्थों की वैज्ञानिक जांच की सुविधा उपलब्ध है।

करोड़ों रुपये की लागत से विकसित इस हाईटेक प्रयोगशाला में खाद्य पदार्थों के साथ पानी, दूध, खाद्य तेल एवं वसा, पैकेजिंग सामग्री और पर्यावरणीय नमूनों सहित करीब 256 तरह के पोषण एवं खाद्य उत्पादों की जांच की जा सकती है। प्रयोगशाला को भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता प्राप्त है तथा खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए गए सरकारी नमूनों की भी जांच यहां की जाती है।

नमूने की पहचान से दूर रखकर होती है जांच

आरएलआरसी की जांच प्रक्रिया में निष्पक्षता को विशेष महत्व दिया जाता है। प्रयोगशाला में परीक्षण करने वाले तकनीकी विशेषज्ञों को यह जानकारी नहीं दी जाती कि नमूना किस कंपनी, फर्म या उत्पादक का है। उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत बिना पहचान वाले नमूने उपलब्ध कराए जाते हैं। इसके बाद आधुनिक उपकरणों और निर्धारित वैज्ञानिक मानकों के आधार पर परीक्षण किया जाता है।

लैब में अनुभवी कैमिकल इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ नमूनों का परीक्षण करते हैं। लैब प्रबंधक डा. आशीष सक्सेना के नेतृत्व में टीम खाद्य सुरक्षा से जुड़े नवीनतम नियमों और परीक्षण प्रक्रियाओं का लगातार अध्ययन करती है। प्रयोगशाला में खाद्य सुरक्षा और परीक्षण से संबंधित आधुनिक संदर्भ पुस्तकें भी उपलब्ध हैं।

दूध-पानी को लेकर भ्रम, आंकड़े बताते हैं अलग तस्वीर

आरएलआरसी प्रमुख डा. घनश्याम खंडेलवाल का कहना है कि दूध और पानी प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए इनकी गुणवत्ता को लेकर जागरूकता जरूरी है। उनके अनुसार खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर लोगों के बीच कई बार ऐसी धारणाएं बन जाती हैं, जो वैज्ञानिक परीक्षण के बाद सही साबित नहीं होतीं।

उनका कहना है कि अब तक प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए आए नमूनों में बहुत कम नमूने गुणवत्ता अथवा निर्धारित मानकों के विपरीत पाए गए हैं। दूध में सिंथेटिक पदार्थ मिलाकर तैयार किए जाने जैसी आशंकाओं को लेकर भी लोगों में काफी भ्रम है। उनके अनुसार प्रयोगशाला में प्राप्त नमूनों के वैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर ही किसी उत्पाद की गुणवत्ता के बारे में निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।

खबर में ‘नमूना फेल’ से पहले समझना जरूरी है पूरी रिपोर्ट: डॉ घनश्याम खंडेलवाल

डा. घनश्याम खंडेलवाल के अनुसार समाचारों में अक्सर किसी खाद्य या पेय पदार्थ के नमूने फेल होने की खबर प्रमुखता से सामने आती है, लेकिन परीक्षण रिपोर्ट के वैज्ञानिक पहलुओं पर उतनी चर्चा नहीं होती। इससे आम उपभोक्ता के बीच किसी पूरे उत्पाद या श्रेणी को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है।उन्होंने कहा कि खाद्य पदार्थ के किसी नमूने की गुणवत्ता निर्धारित करने के लिए तय मानकों के अनुरूप वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक है। किस पैरामीटर में कमी या विचलन मिला, उसकी मात्रा कितनी है और निर्धारित मानक क्या है—इन सभी पहलुओं को समझना जरूरी है।

प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स की जांच भी

आरएलआरसी में केवल मिलावट की जांच तक ही सुविधाएं सीमित नहीं हैं। खाद्य उत्पादों की पोषण गुणवत्ता से जुड़े विभिन्न पैरामीटरों की भी जांच की जा सकती है। इसमें प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स और अन्य पोषण संबंधी घटकों का परीक्षण शामिल है। खाद्य तेल एवं वसा, पानी, दूध, पैकेजिंग सामग्री और पर्यावरणीय नमूनों की भी वैज्ञानिक जांच की सुविधा उपलब्ध है।

जांच की प्रकृति के अनुसार शुल्क निर्धारित है, जो लगभग एक हजार से बीस हजार रुपये तक हो सकता है। सरकारी नमूनों की जांच की रिपोर्ट संबंधित विभाग को निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कराई जाती है, जबकि नमूने से संबंधित जानकारी और रिपोर्ट की गोपनीयता का भी ध्यान रखा जाता है।

अपने खाने की गुणवत्ता जानने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी

डा. घनश्याम खंडेलवाल का कहना है कि स्वस्थ जीवन के लिए केवल भोजन करना पर्याप्त नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता के प्रति जागरूक होना भी जरूरी है। लोगों को किसी खाद्य पदार्थ को लेकर केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर धारणा बनाने के बजाय आवश्यकता होने पर वैज्ञानिक परीक्षण कराना चाहिए।

आरएलआरसी में उपलब्ध आधुनिक जांच सुविधाओं का उद्देश्य खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, सुरक्षा और निर्धारित मानकों की वैज्ञानिक तरीके से पड़ताल करना है। इससे उपभोक्ताओं, उत्पादकों और संबंधित विभागों को खाद्य गुणवत्ता के संबंध में तथ्यपरक जानकारी मिल सकती है।

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