- खशबू सिसोदिया मौत मामले में अभियोजन की कहानी संदेह से परे साबित नहीं हुई
- अभियोजन आरोप साबित करने में नाकाम; सीसीटीवी, गवाह और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी नहीं बने निर्णायक आधार
- जज रविन्द्र प्रसाद गुप्ता के फैसले से रिचि अनुराज समेत तीन दोषमुक्त
- विवेचना की कमियों पर पुलिस आयुक्त को जांच के निर्देश
गजेंद्र पटेल (विधि संवाददाता)
टेलीग्राम संवाद, लखनऊ। खशबू सिसोदिया की मौत से जुड़े चर्चित मामले में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या-17, लखनऊ रविन्द्र प्रसाद गुप्ता ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए रिचि अनुराज, आरची अनुराज और राजकुमार सिंह को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। करीब-करीब पूरे मामले की कड़ियों को जोड़ते हुए अदालत ने गवाहों के बयानों, सीसीटीवी फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और विवेचना के दस्तावेजों की विस्तार से समीक्षा की।
फैसले में अदालत ने केवल आरोपों की प्रमाणिकता पर ही विचार नहीं किया, बल्कि विवेचना के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठाए। खास तौर पर राजकुमार सिंह को पहले विवेचना में पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण नामजदगी से बाहर किए जाने और बाद में बिना किसी स्पष्ट अतिरिक्त पुष्टिकारी साक्ष्य के आरोप पत्र में शामिल किए जाने के पहलू को अदालत ने महत्वपूर्ण माना।
20 लाख रुपये और लग्जरी कार की मांग का आरोप
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से दहेज उत्पीड़न और दहेज की मांग से जुड़े आरोप लगाए गए। आरोपों में 20 लाख रुपये नकद और लग्जरी कार की मांग का भी उल्लेख था। रिचि अनुराज के खिलाफ खशबू सिसोदिया की मौत के संबंध में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत वैकल्पिक आरोप भी विचारण का हिस्सा रहा।
अदालत ने पूरे मामले को केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके समर्थन में पेश किए गए साक्ष्यों की कसौटी पर परखा। निर्णय का मूल आधार यही रहा कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन को आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करना होता है और उपलब्ध साक्ष्य उस स्तर तक नहीं पहुंच सके।
खशबू को धक्का देने की बात साबित नहीं हुई
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी खशबू सिसोदिया को वाहन से धक्का दिए जाने के आरोप से जुड़ी थी। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों की पड़ताल के बाद पाया कि ऐसा कोई प्रत्यक्ष या पुष्टिकारी साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे यह स्थापित हो सके कि रिचि अनुराज ने खशबू को धक्का दिया था।
सीसीटीवी फुटेज और उससे संबंधित सामग्री को भी अदालत ने देखा। न्यायालय के अनुसार उपलब्ध सीसीटीवी सामग्री से यह तथ्य निर्णायक रूप से स्थापित नहीं होता कि रिचि ने खशबू को धक्का दिया था। इस तरह अभियोजन की इस महत्वपूर्ण कड़ी को पर्याप्त साक्ष्य का समर्थन नहीं मिल सका।
रात तीन बजे रिचि के साथ देखे जाने की गवाही
अभियोजन गवाह टोटाराम के बयान में सामने आया कि उसने रात करीब तीन बजे खशबू को रिचि के साथ देखा था। वहीं उसके बयान से यह भी सामने आया कि उस समय आरची अनुराज और राजकुमार सिंह खशबू के साथ नहीं थे।
अदालत ने इस गवाही को मामले की परिस्थितियों के साथ जोड़कर देखा। हालांकि किसी व्यक्ति का किसी समय मृतका के साथ होना अपने आप में घटना को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने उपलब्ध समस्त साक्ष्यों की कड़ी को परखा और पाया कि अभियोजन की ओर से ऐसी निर्णायक सामग्री नहीं पेश की गई, जो आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित कर सके।
राजकुमार को पहले विवेचना में हटाया, बाद में चार्जशीट में जोड़ा
फैसले में विवेचना से जुड़ा यह पहलू भी खास तौर पर सामने आया कि राजकुमार सिंह का नाम विवेचक प्रवीण मलिक ने पहले पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण हटा दिया था। बाद में उसे आरोप पत्र में शामिल किया गया।
अदालत ने इस बात पर गौर किया कि बाद में ऐसा कौन-सा अतिरिक्त और पुष्टिकारी साक्ष्य सामने आया, जिसके आधार पर राजकुमार को आरोप पत्र में शामिल किया गया। फैसले में कहा गया कि इस संबंध में पर्याप्त स्पष्टता और पुष्टिकारी सामग्री सामने नहीं आई। यह पहलू विवेचना की विश्वसनीयता से जुड़े सवालों में महत्वपूर्ण रहा।
व्हाट्सऐप चैट और वीडियो पर भी उठे कानूनी सवाल
मामले में व्हाट्सऐप चैट के स्क्रीनशॉट और वीडियो फुटेज को भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। अदालत ने इन साक्ष्यों की वैधानिक प्रक्रिया की भी पड़ताल की।
निर्णय में उल्लेख है कि विवेचना के दौरान इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के लिए आवश्यक धारा 65बी के प्रमाणपत्र की प्रक्रिया विधि के अनुरूप स्थापित नहीं की गई थी। ऐसे में इन सामग्रियों को अभियोजन की कहानी को निर्णायक रूप से प्रमाणित करने वाले साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने में कानूनी बाधा सामने आई।
तत्कालीन एसीपी की गवाही भी रही महत्वपूर्ण
मामले के विवेचक रहे तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त लखनऊ प्रवीण मलिक की गवाही का भी अदालत ने परीक्षण किया। उनके अनुसार विवेचना के दौरान ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह प्रमाणित हो कि खशबू की हत्या कर उसे किसी वाहन से बाहर फेंका गया था। उनके बयान में वाहन पर खून के निशान नहीं मिलने की बात भी सामने आई।
अदालत ने इस गवाही को मामले में उपलब्ध अन्य परिस्थितिजन्य और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ रखकर देखा। इससे अभियोजन की उस कहानी पर भी सवाल खड़े हुए, जिसके आधार पर घटना को आरोपित तरीके से साबित करने का प्रयास किया गया था।
विवेचना की खामियों पर कोर्ट ने अपनाया गंभीर रुख
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा विवेचना में सामने आई कमियों को लेकर है। अदालत ने मामले की जांच और पर्यवेक्षण से जुड़े पहलुओं पर ध्यान देते हुए पुलिस आयुक्त, लखनऊ को विधि के अनुसार जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए।
अदालत ने कहा कि जांच/कार्रवाई की रिपोर्ट तीन माह के भीतर न्यायालय में प्रस्तुत की जाए। साथ ही आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव, गृह को भी भेजने का निर्देश दिया गया।
इस निर्देश के बाद फैसला केवल तीन आरोपियों को दोषमुक्त किए जाने तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि विवेचना की गुणवत्ता और जांच प्रक्रिया की जवाबदेही से भी जुड़ जाता है। अदालत ने स्पष्ट रूप से विवेचना के उन पहलुओं की ओर ध्यान दिलाया, जिन पर सक्षम स्तर से जांच और आवश्यक कार्रवाई अपेक्षित है।
अभियोजन की कड़ियां अदालत की कसौटी पर नहीं टिकीं
पूरे मामले में अदालत ने अभियोजन की ओर से पेश प्रत्येक महत्वपूर्ण कड़ी का परीक्षण किया। दहेज की कथित मांग, खशबू के साथ रिचि की मौजूदगी, धक्का दिए जाने का आरोप, सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और राजकुमार सिंह को आरोप पत्र में शामिल किए जाने की प्रक्रिया—इन सभी पहलुओं को फैसले में परखा गया।
अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या उपलब्ध साक्ष्य आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करते हैं। न्यायालय ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इसका उत्तर नकारात्मक पाया।
संदेह का लाभ, तीनों को मिली राहत
साक्ष्यों के समग्र मूल्यांकन के बाद न्यायालय ने रिचि अनुराज, आरची अनुराज और राजकुमार सिंह को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। फैसले में अदालत ने अभियोजन के आरोपों को प्रमाणित करने के लिए उपलब्ध सामग्री को अपर्याप्त माना।
न्यायिक प्रक्रिया में दोषसिद्धि के लिए अभियोजन को आरोपों को निर्धारित कानूनी मानक के अनुरूप साबित करना होता है। इस मामले में अदालत ने पाया कि प्रस्तुत साक्ष्य उस स्तर तक नहीं पहुंचे, जहां आरोपों के आधार पर दोषसिद्धि की जा सके।
22 सितंबर को खुले न्यायालय में सुनाया फैसला
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश न्यायालय संख्या-17, लखनऊ के न्यायाधीश रविन्द्र प्रसाद गुप्ता ने यह फैसला 22 सितंबर 2026 को खुले न्यायालय में सुनाया। निर्णय पर न्यायाधीश के हस्ताक्षर दर्ज हैं।
फैसले के साथ अदालत ने विवेचना की कमियों पर पुलिस आयुक्त को जांच और कार्रवाई की जिम्मेदारी भी सौंपी है। अब इस दिशा में होने वाली कार्रवाई और तीन माह के भीतर अदालत में पेश की जाने वाली रिपोर्ट इस मामले का अगला महत्वपूर्ण न्यायिक-पुलिस प्रशासनिक पक्ष होगी।











