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जज रविन्द्र प्रसाद गुप्ता ने सुनाई तीन साल की सजा, पिता-पुत्र पर हमला करने वाले चार दोषी जेल भेजे

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लखनऊ। चुनावी रंजिश में पिता-पुत्र के साथ मारपीट कर गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कक्ष संख्या-17, लखनऊ ने चार आरोपियों को दोषसिद्ध करते हुए तीन-तीन वर्ष के कारावास और 20-20 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है। अदालत ने अशोक कुमार, रामसूचित यादव उर्फ बब्लू, रामसागर और उमेश यादव को धारा 308/34 भारतीय दंड संहिता के तहत दोषी माना। साथ ही धारा 323/34 के तहत प्रत्येक को एक-एक वर्ष के कारावास और एक-एक हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। दोनों धाराओं की सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

अदालत ने अपने फैसले में चारों को धारा 504/34 के आरोप से दोषमुक्त किया है। निर्णय 16 सितंबर 2026 को अपर सत्र न्यायाधीश रविन्द्र प्रसाद गुप्ता ने खुले न्यायालय में सुनाया।

अभियोजन के अनुसार 24 फरवरी 2017 की रात करीब नौ बजे जितेन्द्र कुमार लखनऊ से अपने घर मस्तेमऊ लौट रहे थे। गांव के बाहर कुक्कू पंडित की चक्की के पास उमेश यादव, अशोक कुमार, रामसूचित उर्फ बब्लू और रामसागर ने उन्हें रोककर मारपीट की। आरोप था कि जितेन्द्र के घर पहुंचने के बाद भी आरोपी वहां पहुंच गए और उनके पिता प्रमोद कुमार के साथ भी मारपीट की। अभियोजन साक्षियों ने अदालत में लाठी-डंडे, सरिया और बांके से हमला किए जाने की बात कही।

मामले में जितेन्द्र कुमार और उनके पिता प्रमोद कुमार का चिकित्सीय परीक्षण कराया गया था। मेडिकल साक्ष्य में प्रमोद कुमार के सिर में चोट के साथ पैराइटल हड्डी में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। रेडियोलॉजी विशेषज्ञ ने भी सिर की बायीं ओर पैराइटल हड्डी टूटने की बात कही थी। अदालत ने मौखिक साक्ष्य और चिकित्सीय साक्ष्य को मामले में महत्वपूर्ण माना।

बचाव पक्ष ने घटनास्थल को लेकर कथित विरोधाभास, हथियारों की बरामदगी नहीं होने, खून लगी मिट्टी और कपड़े कब्जे में नहीं लिए जाने तथा गवाहों के बयानों में अंतर को आधार बनाया था। अदालत ने कहा कि तहरीर में घटना के प्रत्येक विवरण का होना आवश्यक नहीं है और जांच में हथियार बरामद न होना मात्र इस आधार पर अभियोजन के मामले को संदिग्ध नहीं बनाता, जब प्रत्यक्ष और चिकित्सीय साक्ष्य उपलब्ध हों।

बचाव पक्ष ने जितेन्द्र और प्रमोद को पिता-पुत्र होने के कारण हितबद्ध गवाह बताते हुए उनकी गवाही पर सवाल उठाया था। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। फैसले में कहा गया कि संबंधित गवाह की गवाही को सावधानी से परखा जाना चाहिए, लेकिन केवल रिश्तेदार होने के आधार पर उसका साक्ष्य अविश्वसनीय नहीं हो जाता। अदालत ने उपलब्ध मौखिक एवं अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर धारा 323/34 और 308/34 के आरोप सिद्ध पाए।

सजा सुनाते हुए अदालत ने चारों दोषियों पर धारा 308/34 के तहत 20-20 हजार रुपये और धारा 323/34 के तहत एक-एक हजार रुपये अर्थदंड लगाया। अर्थदंड अदा न करने पर क्रमशः तीन-तीन माह और एक-एक माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि दोषियों पर लगाए गए अर्थदंड की 50 प्रतिशत राशि दोनों चोटिलों जितेन्द्र कुमार और प्रमोद कुमार यादव को दी जाएगी। जेल में बिताई गई पूर्व अवधि सजा में समायोजित होगी।सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया है। अदालत ने चारों दोषियों का सजायाबी वारंट बनाकर जिला कारागार भेजने का निर्देश भी दिया।

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