21.15 लाख के चेक बाउंस मामले में व्यापारी को दो साल की जेल, 35 लाख रुपये जुर्माना

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अर्थदंड में से 30 लाख रुपये की राशि पीड़ित परिवादी को प्रतिकर (मुआवजे) के रूप में दी जाएगी; रकम न देने पर 11 माह की अतिरिक्त सजा

हापुड़। नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक अनादरण (चेक बाउंस) के आठ साल पुराने एक चर्चित मामले में हापुड़ न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट / सिविल जज (सीनियर डिविजन)-द्वितीय, असगर अली-प्रथम की अदालत ने सुनवाई पूरी करते हुए अभियुक्त राजेंद्र कुमार को दोषी करार दिया है। अदालत ने आरोपी को 2 वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई है और उस पर 35 लाख रुपये का भारी-भरकम अर्थदंड (जुर्माना) भी रोपित किया है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि दोषी अर्थदंड की राशि जमा नहीं करता है, तो उसे 11 माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। इसके अलावा, सीआरपीसी की धारा 357 के तहत कुल अर्थदंड 35 लाख रुपये में से 30 लाख रुपये की राशि पीड़ित परिवादी को बतौर क्षतिपूर्ति/प्रतिकर प्रदान करने के आदेश दिए गए हैं। निर्णय सुनाए जाने के बाद दोषी को न्यायिक हिरासत में लेकर नियमानुसार सजायाबी वारंट बनाकर जिला कारागार, हापुड़ भेज दिया गया।

क्या था पूरा मामला

मामला वर्ष 2018 का है। परिवादी मैसर्स राज ट्रेडिंग कंपनी (प्रोप्राइटर सरवचन सिंह, निवासी देवलोक कॉलोनी, हापुड़) की ओर से अधिवक्ता सचिन कुमार गुप्ता ने कोर्ट में परिवाद (शिकायत) दाखिल किया था। परिवाद के अनुसार, अभियुक्त राजेंद्र कुमार (प्रोप्राइटर मैसर्स श्री दुर्गा ट्रेडिंग कंपनी, निवासी पक्का बाग, हापुड़) के साथ उनका लंबे समय से व्यापारिक लेन-देन था।

मार्च 2018 में राजेंद्र कुमार ने राज ट्रेडिंग कंपनी से 21,15,135 रुपये (इक्कीस लाख पंद्रह हजार एक सौ पैंतीस रुपये) का माल खरीदा था। इस बकाया राशि के भुगतान के लिए आरोपी ने पंजाब नेशनल बैंक (शाखा गढ़ रोड, हापुड़) का 24 मार्च 2008 तिथि का चेक (सं. 426364) जारी किया था।

बाउंस हुआ चेक, नोटिस का भी नहीं दिया सन्तोषजनक जवाब

परिवादी सरवचन सिंह ने जब उक्त चेक को भुगतान के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (हापुड़ शाखा) में लगाया, तो 6 अप्रैल 2018 को बैंक ने आरोपी के खाते में पर्याप्त धनराशि न होने (Insufficient Funds) का हवाला देते हुए चेक अनादृत (डिशऑनर) करके वापस लौटा दिया। परिवादी ने अधिवक्ता के माध्यम से 21 अप्रैल 2018 को पंजीकृत डाक से कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद परिवादी ने न्यायालय की शरण ली।

अदालत का निष्कर्ष और सख्त रुख

अदालत में परिवादी की ओर से बिलों की मूल कॉपियां, बैंक डिशऑनर स्लिप, विधिक नोटिस एवं डाक रसीदें साक्ष्य (Documentary Evidence) के रूप में पेश की गईं।सभी मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्यों का सूक्ष्म विश्लेषण करने के बाद अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट असगर अली-प्रथम ने अपने 12 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में टिप्पणी की है।

पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों से परिवादी यह सिद्ध करने में पूरी तरह सफल रहा है कि विवादित चेक विधिक दायित्व की पूर्ति हेतु जारी किया गया था। अभियुक्त धारा 138 एनआई एक्ट के तहत दंडनीय अपराध के लिए सर्व संदेह से परे दोषी सिद्ध होता है।

दण्ड के प्रश्न पर बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह अभियुक्त का प्रथम अपराध है, इसलिए कम से कम सजा दी जाए। वहीं परिवादी के वकील ने अधिकतम सजा की मांग की। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने अपराध की प्रकृति को देखते हुए 2 साल की कैद और 35 लाख रुपये के अर्थदंड की सजा से दंडित किया।

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