डिजिटल लत और विषाक्त रिश्ते आधुनिक जीवन के नए अदृश्य विष

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टेलीग्राम संवाद, कोलकाता। विष अब केवल दूषित भोजन, प्रदूषण या शरीर में पहुंचने वाले हानिकारक तत्वों तक सीमित नहीं रह गया है। बदलती जीवनशैली के बीच डिजिटल स्क्रीन की बढ़ती निर्भरता, तनाव, नकारात्मक सोच और विषाक्त रिश्ते भी व्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले अदृश्य कारक बनते जा रहे हैं। इसी बदलते दौर की चुनौतियों को केंद्र में रखकर पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा उर्फ स्वामी आनंद संगीतम और श्री रजनीश ध्यान मंदिर, सोनीपत के संस्थापक तथा ओशो के छोटे भाई स्वामी शैलेंद्र सरस्वती की सह-लेखित पुस्तक ‘TOXIC’ का 21 अगस्त को कोलकाता के ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर, पार्क स्ट्रीट में विमोचन किया गया।

पुस्तक विमोचन समारोह में कोलकाता के साहित्यिक, रचनात्मक और कला जगत से जुड़े लोगों की मौजूदगी रही। अभिनेत्री देबोलिना दत्ता मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। फलाक़ राशिद रॉय ने मॉडरेटर की भूमिका निभाई, जबकि अंजुजा रॉय गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में मौजूद रहीं। कार्यक्रम में पुस्तक के विषय और आधुनिक जीवन में बढ़ती विभिन्न प्रकार की विषाक्तता पर विस्तार से संवाद हुआ।

विमोचन समारोह में पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा ने आधुनिक जीवन के दो ऐसे अदृश्य खतरों को रेखांकित किया, जिन्हें अक्सर सामान्य दिनचर्या का हिस्सा मान लिया जाता है—डिजिटल एडिक्शन और टॉक्सिक रिलेशनशिप।

डॉ. बत्रा ने कहा कि विषाक्तता को केवल उन तत्वों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, जो शरीर में प्रवेश करते हैं। यह भी देखना जरूरी है कि व्यक्ति अपनी मानसिक और भावनात्मक दुनिया में क्या प्रवेश करने दे रहा है। उनके अनुसार आज विष केवल हमारे रक्तप्रवाह तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी डिजिटल ‘बैंडविड्थ’ तक भी पहुंच रहा है।

उन्होंने डिजिटल एडिक्शन को आधुनिक समय की गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि स्क्रीन के साथ लोगों की निर्भरता लगातार बढ़ रही है। प्रतिदिन कई घंटे स्क्रीन पर बिताने की आदत जीवनशैली, मानसिक संतुलन और सामाजिक रिश्तों को प्रभावित कर सकती है।

डॉ. बत्रा ने टॉक्सिक रिलेशनशिप को आधुनिक जीवन की दूसरी बड़ी चुनौती बताया। ऐसे रिश्ते व्यक्ति को लगातार मानसिक और भावनात्मक दबाव में रख सकते हैं। समय के साथ इसका असर आत्मविश्वास, मानसिक शांति और जीवन के संतुलन पर पड़ सकता है।

‘TOXIC’ इसी तरह के प्रभावों को पहचानने और व्यक्ति को अपने जीवन में मौजूद नकारात्मक प्रभावों के प्रति सजग करने का प्रयास करती है।

कार्यक्रम में डिजिटल निर्भरता के व्यापक प्रभावों पर चर्चा के दौरान भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में डिजिटल एडिक्शन को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए उभरती चुनौती के रूप में रेखांकित किए जाने का भी उल्लेख किया गया।

आज डिजिटल तकनीक शिक्षा, रोजगार, मनोरंजन, खरीदारी और सामाजिक संपर्क तक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाना व्यावहारिक समाधान नहीं है। आवश्यकता इसके संतुलित और जागरूक उपयोग की है। पुस्तक का संदेश भी इसी दिशा में है कि व्यक्ति को यह समझना होगा कि वह अपने शरीर के साथ-साथ अपने मन और भावनाओं को किस तरह की ‘खुराक’ दे रहा है।

मुख्य अतिथि अभिनेत्री देबोलिना दत्ता ने कहा कि कलाकार और दर्शक दोनों ऐसी संस्कृति का हिस्सा हैं, जो हमारे सोचने, रिश्तों को देखने और अपने आसपास की दुनिया को समझने के नजरिए को प्रभावित करती है। ऐसे में यह सवाल जरूरी है कि हम शारीरिक स्तर पर क्या ग्रहण कर रहे हैं और मानसिक तथा भावनात्मक स्तर पर क्या स्वीकार कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि ‘TOXIC’ इस महत्वपूर्ण विषय पर सहज तरीके से बातचीत शुरू करती है और पाठकों को अपने जीवन में मौजूद उन प्रभावों को पहचानने का अवसर देती है, जो धीरे-धीरे मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

‘TOXIC’ को डॉ. मुकेश बत्रा के लगभग पांच दशक लंबे चिकित्सकीय अनुभव से भी जोड़कर देखा जा रहा है। डॉ. बत्रा के अनुसार पुस्तक उनके करीब 50 वर्षों के क्लिनिकल अनुभव से निकली समझ और अनुभवों का परिणाम है।

पुस्तक में वास्तविक जीवन की कहानियों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यावहारिक उपायों के जरिए यह समझाने का प्रयास किया गया है कि विषाक्तता हमेशा दिखाई नहीं देती। कई बार व्यक्ति सामान्य दिनचर्या के बीच ऐसी आदतों, परिस्थितियों या रिश्तों में जी रहा होता है, जो उसके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को लगातार प्रभावित कर रहे होते हैं।

स्वस्थ जीवन के लिए मानसिक आहार पर भी निगरानी जरूरी

पुस्तक का केंद्रीय संदेश है कि स्वस्थ जीवन के लिए केवल शरीर की देखभाल पर्याप्त नहीं है। जिस तरह व्यक्ति भोजन और शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर सजग रहता है, उसी तरह विचारों, भावनाओं, रिश्तों और डिजिटल जीवन के प्रति भी जागरूकता जरूरी है।

‘TOXIC’ डिजिटल ओवरलोड, जीवनशैली से जुड़े तनाव, विषाक्त आदतों और खराब रिश्तों जैसी परिस्थितियों को पहचानने तथा उनसे निपटने की दिशा में पाठकों को सोचने के लिए प्रेरित करती है। पुस्तक का जोर समस्या की पहचान के साथ-साथ जीवन में संतुलन और जागरूकता विकसित करने पर है।

बुक-साइनिंग में पाठकों से सीधा संवाद

कार्यक्रम के समापन पर बुक-साइनिंग सत्र आयोजित किया गया। डॉ. मुकेश बत्रा ने पाठकों और शुभचिंतकों से संवाद किया तथा पुस्तक के विषय और उसके पीछे की सोच पर चर्चा की। इससे विमोचन कार्यक्रम औपचारिक आयोजन से आगे बढ़कर लेखकों और पाठकों के बीच प्रत्यक्ष संवाद का मंच भी बना।

डॉ. मुकेश बत्रा और स्वामी शैलेंद्र सरस्वती की सह-लेखित ‘TOXIC’ आधुनिक जीवन की उन चुनौतियों को सामने लाती है, जिन्हें अक्सर सामान्य दिनचर्या का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। पुस्तक का मूल सवाल यही है कि तेजी से डिजिटल होती दुनिया और बदलते रिश्तों के बीच व्यक्ति अपने मन, शरीर और भावनात्मक जीवन को नकारात्मक प्रभावों से किस तरह सुरक्षित रख सकता है।

इस लिहाज से ‘TOXIC’ का संदेश केवल स्क्रीन टाइम कम करने या खराब रिश्तों से दूर रहने तक सीमित नहीं है। यह व्यक्ति को अपने जीवन के प्रति अधिक सजग होने की ओर प्रेरित करता है—वह क्या देख रहा है, क्या सोच रहा है, किन भावनाओं को भीतर जगह दे रहा है और किन रिश्तों को अपने जीवन का हिस्सा बना रहा है। यही सजगता संतुलित और स्वस्थ जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकती है।

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