ओशो अनुज स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी से श्री रजनीश ध्यान मंदिर, सोनीपत मे हमारे संपादक(दिल्ली-एनसीआर) पवन सचदेवा की पिछले सप्ताह हुई विशेष बातचीत के कुछ अंश
पवन सचदेवा – संपादक(दिल्ली-एनसीआर)
सोनीपत। आध्यात्मिक जीवन की यात्रा किसी बाहरी पहचान, प्रमाण-पत्र या औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उठने वाली उस गहरी पुकार से शुरू होती है, जो उसे ध्यान, प्रेम, जागरूकता और आत्मबोध की ओर ले जाती है। इसी विचार को सामने रखते हुए ओशो के छोटे भाई, एमबीबीएस स्वर्ण पदक प्राप्त चिकित्सक और आध्यात्मिक गुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने कहा कि संन्यास कोई बाहरी औपचारिकता नहीं, बल्कि भीतर घटने वाला गहरा रूपांतरण है।

प्रश्न : स्वामी जी, क्या आज कोई व्यक्ति बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के ओशो का संन्यासी बन सकता है? क्या इसके लिए किसी गुरु से औपचारिक दीक्षा लेना आवश्यक है?
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती : ओशो की दृष्टि में संन्यास कोई बाहरी औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर घटने वाला गहरा रूपांतरण है। जैसे प्रेम के लिए किसी अनुमति या प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही शिष्यत्व भी भीतर से पैदा होने वाली प्रेम और समर्पण की भावना है। जब किसी व्यक्ति के भीतर ओशो की दृष्टि, ध्यान और जीवन-दर्शन के प्रति गहरी प्यास पैदा होती है, तो वही उसके संन्यास की वास्तविक शुरुआत है।

प्रश्न : लेकिन सामान्यतः तो शिष्य बनने के लिए गुरु से दीक्षा लेने की परंपरा रही है?
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती : हां, परंपरा में दीक्षा का अपना महत्व रहा है। लेकिन ओशो ने संन्यास को धीरे-धीरे औपचारिकताओं से मुक्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया। शुरुआत में उन्होंने संन्यास की एक व्यवस्था बनाई, क्योंकि साधकों को एक प्रारंभिक आधार और पहचान की जरूरत थी।इसे आप प्राथमिक कक्षा की तरह समझ सकते हैं, जहां बच्चे को अक्षर सिखाने के लिए किसी परिचित चित्र या वस्तु का सहारा लिया जाता है। लेकिन जैसे-जैसे शिक्षा आगे बढ़ती है, तस्वीरें पीछे छूट जाती हैं और अक्षर का वास्तविक अर्थ सामने आता है।इसी तरह संन्यास भी बाहरी प्रतीकों और औपचारिकताओं से आगे बढ़कर भीतर की चेतना और जागरूकता का विषय बन जाता है।
प्रश्न : तो क्या बिना किसी को बताए भी कोई व्यक्ति स्वयं को ओशो का संन्यासी मान सकता है?
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती : बिल्कुल। यदि उसके भीतर ओशो के प्रति प्रेम, ध्यान के प्रति समर्पण और जीवन को अधिक जागरूकता से जीने की प्यास पैदा हो गई है, तो वह संन्यास की भावना में प्रवेश कर चुका है। इसके लिए किसी घोषणा की अनिवार्यता नहीं है।महत्वपूर्ण यह नहीं कि दुनिया आपको क्या मानती है, बल्कि यह है कि आपके भीतर क्या घट रहा है।

प्रश्न : क्या इसका अर्थ यह है कि अब संन्यास का पूरा उत्तरदायित्व साधक का ही है?
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती : हां, यही इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात है। ओशो का संदेश व्यक्ति को स्वतंत्रता और अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वीकार करने की ओर ले जाता है। गुरु हमेशा हाथ पकड़कर नहीं चला सकता। एक समय ऐसा आता है जब साधक को अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है।संन्यास की परिपक्वता भी यही है कि व्यक्ति अपने निर्णय स्वयं ले और अपनी साधना के प्रति स्वयं जिम्मेदार बने।
प्रश्न : फिर गुरु की भूमिका क्या रह जाती है?
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती : गुरु आदेश देने वाला नहीं, दिशा दिखाने वाला हो सकता है। मैं आपको यह आदेश नहीं दूंगा कि आप संन्यासी बनिए या ध्यान कीजिए। मैं आपको बता सकता हूं कि ध्यान क्या है, प्रेम क्या है और जागरूकता क्या है।यदि उसे सुनकर आपके भीतर प्यास पैदा होती है, तो आगे का कदम आपको स्वयं उठाना है। यदि प्रेम की बात सुनकर भीतर कोई गीत नहीं उठता, तो केवल आदेश देने से प्रेम पैदा नहीं हो सकता। लेकिन यदि भीतर से कोई पुकार उठती है, तो फिर किसी बाहरी अनुमति की आवश्यकता नहीं रहती।

प्रश्न : तो क्या संन्यास को आप स्वतंत्रता से जोड़कर देखते हैं?
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती : निश्चित रूप से। वास्तविक संन्यास किसी बंधन में डालने का नाम नहीं, बल्कि भीतर की स्वतंत्रता को पहचानने का नाम है। व्यक्ति अपने निर्णय, अपनी साधना और अपने जीवन के प्रति जागरूक होता है।इसलिए संन्यास किसी पर थोपा नहीं जा सकता। यह भीतर की प्यास, प्रेम और पुकार से जन्मता है।

प्रश्न : अंततः आप उन लोगों से क्या कहेंगे जो ओशो की राह पर चलना चाहते हैं, लेकिन औपचारिक संन्यास को लेकर असमंजस में हैं?
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती : मैं यही कहूंगा कि पहले अपने भीतर देखें। क्या आपके भीतर ध्यान की प्यास है? क्या ओशो के प्रति प्रेम और उनकी जीवन-दृष्टि को समझने की आकांक्षा है? क्या आप अपने जीवन को अधिक जागरूक, प्रेमपूर्ण और आनंदमय बनाना चाहते हैं?यदि भीतर से उत्तर ‘हां’ है, तो यात्रा शुरू हो चुकी है। संन्यास किसी बाहरी घोषणा से अधिक भीतर की एक अवस्था है। आप स्वतंत्र हैं—आपकी प्यास, आपकी पुकार और आपका निर्णय ही निर्णायक है।











