फिल्म अभिनेता व कार्यक्रम के मुख्य अतिथि- शत्रुघ्न सिन्हा और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की मौजूदगी में ‘टॉक्सिक’ पुस्तक का विमोचन, स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी व डॉ. मुकेश बत्रा ने साझा किए विचार
पद्मश्री डॉ.मुकेश बत्रा ने मानसिक विषाक्तता, चिंता-अवसाद के शुरुआती संकेतों और होम्योपैथी की भूमिका पर की चर्चा
पवन सचदेवा
सम्पादक(दिल्ली-एनसीआर)
टेलीग्राम संवाद, नई दिल्ली
दिल्ली के बाराखंबा रोड स्थित,होटल ललित रीजेंसी में आज ‘टॉक्सिक’ विषय पर आयोजित मीडिया कार्यक्रम में मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक विषाक्तता के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम में सांसद एवं फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा , पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा और ओशो अनुज स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी उपस्थित रहे। इस अवसर पर डॉ. मुकेश बत्रा और स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी द्वारा सहलिखित पुस्तक ‘टॉक्सिक : स्टोरीज, साइंस एंड रेमेडीज फॉर ए क्लीनर माइंड, बॉडी एंड स्पिरिट’ का विमोचन भी किया गया।

कार्यक्रम में बोलते हुए स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने कहा कि विषाक्तता को केवल बाहरी वातावरण, प्रदूषण या खान-पान से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। व्यक्ति के विचार, भावनाएं, व्यवहार, तनाव और रिश्तों में पैदा होने वाली नकारात्मकता भी उसके मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की खुशहाली को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि अपने भीतर चल रही प्रक्रियाओं को पहचानना और आवश्यकता के अनुसार उनमें बदलाव लाना स्वस्थ और संतुलित जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

ध्यान स्वयं को समझने की प्रक्रिया : स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने ध्यान, मन की बेचैनी के कारणों और आंतरिक शांति पर संवाद करते हुए कहा कि ध्यान को केवल किसी तकनीक के रूप में देखने के बजाय जागरूकता और स्वयं को समझने की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए। जब व्यक्ति अपने भीतर चल रही हलचल को समझने लगता है, तब जीवन में अधिक शांति और संतुलन की संभावना पैदा होती है। उन्होंने आध्यात्मिक जीवन में मौजूद कुछ ऐसे पहलुओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया, जिन्हें वे ‘आध्यात्मिक विषाक्तता’ मानते हैं। उन्होंने कहा कि तथाकथित धार्मिक अंधविश्वास, जीवन-विरोधी दृष्टिकोण, अवैज्ञानिक कर्मकांड, स्वर्ग और नरक का भय अथवा प्रलोभन तथा ग्रंथों और शास्त्रों का केवल सैद्धांतिक बोझ वास्तविक आत्मज्ञान की खोज में बाधा बन सकता है। उनके अनुसार व्यक्ति को बाहरी मान्यताओं के बजाय स्वयं के अनुभव और जागरूकता के माध्यम से सत्य की खोज करनी चाहिए।
मानसिक विषाक्तता और स्वास्थ्य पर डॉ. मुकेश बत्रा ने रखी बात
पद्मश्री डॉ. मुकेश बत्रा ने मानसिक विषाक्तता और खुशहाली के बीच संबंध पर चर्चा करते हुए चिंता और अवसाद के शुरुआती संकेतों के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता बताई। उन्होंने स्वास्थ्य देखभाल में होम्योपैथी की भूमिका पर भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने पर्यावरणीय प्रदूषण के साथ-साथ मनुष्य के जीवन में मौजूद मानसिक और भावनात्मक ‘जहर’ को पहचानने की जरूरत पर जोर दिया।
‘टॉक्सिक’ पुस्तक में शरीर से लेकर मन और रिश्तों तक की चर्चा
विमोचित पुस्तक में शरीर और जीवनशैली से जुड़े विषैले तत्वों के साथ तनाव, नकारात्मक विचारों, भावनात्मक दबाव और रिश्तों में पैदा होने वाली मानसिक विषाक्तता को समझने तथा उनसे बाहर निकलने के उपायों पर चर्चा की गई है। पुस्तक का उद्देश्य शरीर, मन और आत्मिक जीवन को प्रभावित करने वाले विभिन्न प्रकार के ‘टॉक्सिक’ तत्वों के प्रति जागरूकता पैदा करना बताया गया।
शत्रुघ्न सिन्हा बोले -ओशो की वाणी से होती है उनके दिन की शुरुआत
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने ओशो के प्रति अपने जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा कि बॉलीवुड में ओशो के दो बड़े प्रशंसकों में एक वे स्वयं हैं और दूसरे फिल्म निर्माता सुभाष घई हैं। उन्होंने बताया कि उनकी सुबह ओशो की वाणी सुनने से होती है और रात में भी वे ओशो के प्रवचन सुनते-सुनते सोते हैं।
वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री भारत सरकार, श्रीमती मेनका संजय गांधी ने पुस्तक की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि व्यक्ति अपने जीवन में मौजूद विषाक्त तत्वों के प्रति सचेत हो। उन्होंने कहा कि हमें पहचानना होगा कि हमारे जीवन में कहां-कौन से ‘टॉक्सिक’ तत्व मौजूद हैं, ताकि उनसे बचने और स्वस्थ जीवन की दिशा में आगे बढ़ने के उपाय किए जा सकें।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि स्वस्थ जीवन के लिए केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन, विचारों, भावनाओं, संबंधों और आंतरिक जीवन को भी समझना और संतुलित करना आवश्यक है।













