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एडीजे रविन्द्र प्रसाद गुप्ता ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल

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10 साल पुराने मुकदमे में माल मुकदमाती नहीं मिलने पर कोर्ट सख्त

कहा- पुलिस की गंभीर चूक से प्रभावित हो रही आपराधिक न्याय प्रक्रिया

गजेंद्र पटेल(विधि संवाददाता)

लखनऊ। दस साल पुराने चोरी के मुकदमे में माल मुकदमाती न्यायालय के सामने पेश नहीं किए जाने पर अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या-17, लखनऊ रविन्द्र प्रसाद गुप्ता ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने टिप्पणी की कि मालखाने का चार्ज हस्तांतरित न किए जाने के कारण मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है। कोर्ट ने इसे पुलिस की कार्यप्रणाली में गंभीर चूक बताते हुए इसे आपराधिक न्याय तंत्र की विफलता का संकेत माना है।

मामला सत्र परीक्षण संख्या-594/2016, मुकदमा अपराध संख्या-593/2011, धारा 457, 380 और 411 आईपीसी, सरकार बनाम अशोक यादव, आशिक, थाना गोमतीनगर, लखनऊ से संबंधित है। सुनवाई के दौरान पत्रावली साक्ष्य के लिए नियत थी। पुकार पर अभियुक्त की ओर से हाजिरी माफी प्रस्तुत की गई, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।

इसी दौरान थाना गोमतीनगर पुलिस की ओर से सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता फौजदारी के माध्यम से प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया। पुलिस ने न्यायालय को बताया कि मामले में तलब किया गया माल मुकदमाती पूर्व हेड मोहर्रिर अवधेश कुमार सिंह द्वारा मालखाने का चार्ज न दिए जाने के कारण न्यायालय में पेश नहीं किया जा सकता। इस संबंध में पुलिस उपायुक्त पूर्वी द्वारा पुलिस अधीक्षक हरदोई को 1 फरवरी 2025 और 15 अप्रैल 2025 को भेजे गए पत्रों की प्रतियां भी न्यायालय में दाखिल की गईं।

पत्रावली के अवलोकन के बाद न्यायालय ने पाया कि मामला वर्ष 2011 के अपराध से संबंधित है और वर्ष 2016 में आरोप विरचित किए गए थे। इसके बाद अब तक केवल एक गवाह अमर नाथ मौर्या का ही साक्ष्य दर्ज हो सका है। माल मुकदमाती के अभाव में साक्ष्य की आगे की कार्रवाई बाधित है।

न्यायालय ने कहा कि यह स्थिति संबंधित थाने की कार्यप्रणाली की खामियों को दर्शाती है। कोर्ट के अनुसार, पूर्व मालखाना मोहर्रिर द्वारा चार्ज नहीं दिए जाने के कारण माल मुकदमाती पेश न हो पाने का कथन लखनऊ पुलिस की कार्यप्रणाली में गंभीर चूक को प्रदर्शित करता है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि इससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

अदालत ने आदेश की प्रति संबंधित थानाध्यक्ष को भेजते हुए निर्देश दिया है कि वह स्पष्ट करें कि मालखाने का चार्ज हैंडओवर कराने के लिए अब तक क्या-क्या कार्रवाई की गई है। इसकी विस्तृत कार्यवाही आख्या निर्धारित तिथि तक न्यायालय में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।

साथ ही न्यायालय ने नियमानुसार कार्रवाई करते हुए माल मुकदमाती और संबंधित साक्षी को 8 अक्टूबर 2026 को साक्ष्य के लिए न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।

न्यायालय ने पुलिस उपायुक्त पूर्वी को भी निर्देश दिया है कि वह थाने से आख्या प्राप्त कर स्वयं अपनी रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें। इसमें यह बताना होगा कि संबंधित मालखाना मोहर्रिर द्वारा मालखाने का चार्ज नहीं दिए जाने के कारण कुल कितने मुकदमों की विचारण प्रक्रिया प्रभावित हुई और इस संबंध में उनके स्तर से अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश की एक प्रति पुलिस आयुक्त, लखनऊ को भी भेजी गई है। न्यायालय ने उन्हें निर्देश दिया है कि मामले में तत्काल जांच कर यह स्पष्ट कराएं कि मालखाने का चार्ज न दिए जाने के मामले में अब तक कौन-कौन सी विभागीय एवं प्रशासनिक कार्रवाई की गई है। इसकी रिपोर्ट भी निर्धारित तिथि तक न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा गया है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित तिथि तक संबंधित अधिकारियों की आख्या प्राप्त नहीं होती है तो यह माना जाएगा कि उन्हें इस संबंध में कुछ नहीं कहना है और इसके बाद न्यायालय द्वारा विधिक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

यह आदेश अपर सत्र न्यायाधीश रविन्द्र प्रसाद गुप्ता, कोर्ट संख्या-17, लखनऊ द्वारा पारित किया गया है।

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