- तथ्यों को छिपाकर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल करने पर अदालत सख्त
- पूर्व मौखिक टिप्पणी को बताया अनावश्यक; सरकारी अधिवक्ता कार्यालय की भूमिका पर भी उठाए सवाल।
टेलीग्राम संवाद
प्रयागराज/बरेली। न्यायालय में तथ्यों को छिपाकर राहत हासिल करने की कोशिश याची को भारी पड़ गई। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के सट्टेबाजी के कथित आरोपी ओमेंद्र यादव की दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं खारिज करते हुए उस पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि याची ने एक ही प्रकरण में दो याचिकाएं दाखिल कीं और दूसरी याचिका में पहली याचिका का उल्लेख तक नहीं किया। मामले का पूरा घटनाक्रम सामने आने के बाद हाईकोर्ट ने बरेली के एसएसपी अनुराग आर्या के खिलाफ पूर्व में की गई कठोर मौखिक टिप्पणियों पर भी पुनर्विचार किया। अदालत ने उन टिप्पणियों को अनावश्यक बताते हुए सच्चे हृदय से खेद व्यक्त किया। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ का यह रुख न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और याचिकाकर्ताओं की जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अवैध हिरासत का आरोप लगाकर दाखिल की थी याचिका
याची ओमेंद्र यादव ने पुलिस पर उसे अवैध रूप से हिरासत में रखने का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी। उसका दावा था कि पुलिस ने उसे आठ मई से 13 मई तक हिरासत में रखा और 13 मई को उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्शाई। हालांकि, सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने याचिका में तथ्यों और विवरणों को प्रस्तुत करने के तरीके पर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि कथित अवैध हिरासत की तारीख, समय और स्थान का स्पष्ट विवरण मुख्य याचिका में नहीं दिया गया था। यह महत्वपूर्ण जानकारी याचिका के बजाय समर्थन में दाखिल हलफनामे के पृष्ठ संख्या 27 पर दर्ज थी। अदालत ने इस तथ्य को मामले की सुनवाई के लिहाज से महत्वपूर्ण माना।
एक मामले में दो याचिकाएं, दूसरी में पहली कार्यवाही छिपाई
सुनवाई के दौरान न्यायालय के सामने याची के आचरण का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया। पता चला कि ओमेंद्र यादव ने एक ही घटनाक्रम को लेकर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल की थीं। पहली याचिका पर राज्य सरकार की ओर से 18 मई को जवाब दाखिल किया जा चुका था। इसके बावजूद याची ने 26 मई को दूसरी याचिका दाखिल कर दी। दूसरी याचिका में पहली याचिका दाखिल किए जाने और उस पर हुई कार्यवाही का कोई उल्लेख नहीं किया गया। खंडपीठ ने इसे महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने और न्यायालय के समक्ष भ्रामक स्थिति प्रस्तुत करने वाला आचरण माना। इसी आधार पर दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए याची पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया गया।
27 अक्टूबर को एसएसपी के हलफनामे पर जताई थी नाराजगी
इस मामले में 27 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान बरेली के एसएसपी अनुराग आर्या की ओर से दाखिल हलफनामे में सीसीटीवी से संबंधित विवरण उपलब्ध नहीं होने पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई थी। खंडपीठ ने प्रदेश पुलिस में सीसीटीवी कैमरों के खराब होने की प्रवृत्ति को लेकर भी गंभीर मौखिक टिप्पणी की थी। उस समय अदालत ने प्रथमदृष्टया एसएसपी के हलफनामे को गलत मानते हुए उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया था। इस घटनाक्रम के बाद पुलिस अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठने लगे थे। हालांकि, आगे की सुनवाई में याची की ओर से महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाए जाने की बात सामने आने पर मामले की तस्वीर बदल गई।
एसएसपी अनुराग आर्या पर मौखिक टिप्पणी को अदालत ने बताया अनावश्यक
मामले के वास्तविक तथ्य सामने आने के बाद खंडपीठ ने अपने पूर्व रुख पर पुनर्विचार किया। अदालत ने स्वीकार किया कि एसएसपी अनुराग आर्या के खिलाफ पूर्व में की गई कठोर मौखिक टिप्पणियां अनावश्यक थीं। इसके लिए खंडपीठ ने सच्चे हृदय से खेद व्यक्त किया। अदालत ने अपर शासकीय अधिवक्ता कार्यालय की भूमिका पर भी सवाल उठाए। खंडपीठ का कहना था कि यदि शुरुआत में ही सरकारी पक्ष की ओर से न्यायालय को बता दिया जाता कि याचिका में महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए हैं और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो एसएसपी को इस तरह की नाराजगी का सामना नहीं करना पड़ता। अदालत ने इस स्थिति के लिए याची के साथ-साथ सरकारी अधिवक्ता कार्यालय की चूक को भी रेखांकित किया।
न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट का कड़ा संदेश
हाईकोर्ट का यह आदेश उन याचिकाकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश है, जो आपराधिक मामलों में राहत पाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक राहत मांगना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन इसके लिए तथ्यों को पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत करना अनिवार्य है। किसी मामले में पहले से दाखिल याचिका और उस पर हुई कार्यवाही को छिपाकर दोबारा याचिका दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इस प्रकरण में अदालत ने आरोपी होने के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों को छिपाने और न्यायालय के समक्ष भ्रामक स्थिति प्रस्तुत करने के आचरण पर सख्ती दिखाई। ओमेंद्र यादव पर 50 हजार रुपये का हर्जाना और एसएसपी अनुराग आर्या पर पूर्व की मौखिक टिप्पणियों के लिए खेद व्यक्त करना, दोनों ही इस आदेश के महत्वपूर्ण पहलू हैं।










