- काकोरी के मुकदमे में अवैध शराब की बरामदगी साबित नहीं कर सका अभियोजन
- गवाहों के बयानों में विरोधाभास और स्वतंत्र गवाहों की गैरमौजूदगी का मिला लाभ।
टेलीग्राम संवाद
लखनऊ।आबकारी अधिनियम और मिलावटी शराब से जुड़े करीब 17 साल पुराने मुकदमे में लखनऊ की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी बैनाम को दोषमुक्त कर दिया। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या-17, लखनऊ के न्यायाधीश रविन्द्र प्रसाद गुप्ता ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि कथित शराब बरामदगी को लेकर पुलिस के बयान में विरोधाभास हैं और बरामद शराब को न्यायालय के समक्ष विधिवत साबित नहीं किया जा सका। अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश दिया।
अदालत का यह फैसला इस बात पर केंद्रित रहा कि आपराधिक मुकदमे में आरोपों को साबित करने के लिए केवल पुलिस की ओर से बरामदगी का दावा पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रस्तुत साक्ष्य विश्वसनीय होने चाहिए और अभियोजन को आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करना होता है।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन के मुताबिक, मामला थाना काकोरी, जनपद लखनऊ में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 187/2009 से जुड़ा था। पुलिस का दावा था कि 25 मार्च 2009 की सुबह करीब 4:30 बजे ग्राम भटऊ जमालपुर के पास गश्त के दौरान आरोपी बैनाम को रोका गया। उसके पास मौजूद प्लास्टिक की पिपिया में कथित तौर पर 10 लीटर कच्ची शराब बरामद हुई थी।
पुलिस ने आरोप लगाया था कि शराब बनाने में महुआ, गुड़ और यूरिया का इस्तेमाल किया गया था तथा आरोपी के पास शराब रखने का वैध लाइसेंस नहीं था। इस आधार पर आरोपी के खिलाफ आबकारी अधिनियम की धारा 60 और भारतीय दंड संहिता की धारा 272 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। विवेचना के बाद पुलिस ने आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया।
अदालत में खाली मिली कथित बरामदगी की पिपिया
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने सबसे अहम सवाल कथित बरामद शराब की उपलब्धता और उसकी बरामदगी को साबित करने का था। अभियोजन पक्ष ने बरामदगी और गिरफ्तारी के संबंध में तत्कालीन उपनिरीक्षक मोहम्मद मुजतबा को मुख्य गवाह के रूप में पेश किया।
अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, जिस पिपिया में शराब बरामद होने का दावा किया गया था, उसे न्यायालय के समक्ष पेश किए जाने पर वह खाली मिली। अभियोजन पक्ष की ओर से बताया गया कि संभवतः उसमें रखी शराब बह गई होगी, लेकिन शराब कैसे और किन परिस्थितियों में बह गई, इस संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण या जांच रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई।
अदालत ने इस पहलू को महत्वपूर्ण माना। रिकॉर्ड में यह भी दर्ज था कि थाने में माल दाखिल किए जाने के समय पिपिया के टूटी हुई होने की बात सामने नहीं आई थी। ऐसे में कथित बरामद शराब का न्यायालय में प्रस्तुत न होना अभियोजन के मामले को कमजोर करने वाला तथ्य बना।
स्वतंत्र गवाह नहीं, पुलिसकर्मियों के बयानों में भी विरोधाभास
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने बरामदगी की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि कथित घटना के समय किसी स्वतंत्र व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया गया। अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि बरामदगी के मुख्य गवाह ने स्वीकार किया था कि किसी सार्वजनिक व्यक्ति को गवाह बनाने का प्रयास नहीं किया गया।
अदालत ने पुलिस गवाह के बयान और घटनास्थल के नक्शे के बीच भी अंतर रेखांकित किया। बरामदगी संबंधी दस्तावेज में आरोपी के एक दिशा से आने का उल्लेख था, जबकि गवाह ने जिरह के दौरान उसके दूसरी दिशा से आने की बात कही। अदालत के अनुसार, इस विरोधाभास ने बरामदगी के घटनाक्रम पर संदेह पैदा किया।
हालांकि, स्वतंत्र गवाह का न होना अपने आप में किसी अभियोजन को असफल नहीं बनाता, लेकिन इस मामले में अदालत ने इसे अन्य कमियों और विरोधाभासी साक्ष्यों के साथ समग्र रूप से परखा।
यूरिया मिलने की रिपोर्ट के बावजूद अभियोजन क्यों नहीं जीत सका?
अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी कि विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट में नमूने में यूरिया की मौजूदगी पाई गई थी। सरकारी अधिवक्ताओं ने इसी आधार पर आरोपी को दोषी ठहराए जाने की मांग की।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने बरामदगी की विश्वसनीयता, स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति और कथित बरामद माल को न्यायालय में साबित न किए जाने पर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि प्रयोगशाला रिपोर्ट में यूरिया मिलने का उल्लेख होने के बावजूद अभियोजन को यह भी विश्वसनीय रूप से स्थापित करना था कि जांच के लिए भेजा गया नमूना आरोपी से कथित तौर पर बरामद शराब से ही संबंधित था।
अदालत ने नमूना परीक्षण के लिए भेजने में हुए विलंब और विवेचना के दौरान सामने आई कमियों को भी अपने मूल्यांकन में शामिल किया। अंततः न्यायालय ने माना कि उपलब्ध मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
साक्ष्यों की संख्या नहीं, विश्वसनीयता महत्वपूर्ण: अदालत
फैसले में अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 134 तथा सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख किया। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी तथ्य को साबित करने के लिए गवाहों की कोई निश्चित संख्या आवश्यक नहीं है; गवाही की गुणवत्ता और विश्वसनीयता अधिक महत्वपूर्ण होती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि एक विश्वसनीय गवाह की गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हो सकती है, लेकिन यदि गवाही संदेहास्पद हो, तो न्यायालय को साक्ष्य की पुष्टि और उसकी विश्वसनीयता का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना होता है।
इस मामले में अदालत ने मुख्य बरामदगी गवाह के बयान में विरोधाभास, स्वतंत्र गवाहों को शामिल करने का प्रयास न किए जाने, कथित बरामद शराब के न्यायालय में साबित न होने और विवेचना से जुड़ी कमियों को एक साथ देखते हुए अभियोजन के दावे को संदेह से परे स्वीकार करने योग्य नहीं पाया।
संदेह का लाभ देकर आरोपी को किया दोषमुक्त
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कोर्ट संख्या-17, लखनऊ ने 13 अक्टूबर 2026 को पारित निर्णय में आरोपी बैनाम को आबकारी अधिनियम की धारा 60 और भारतीय दंड संहिता की धारा 272 के तहत लगाए गए आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में असफल रहा, इसलिए आरोपी संदेह का लाभ पाने का अधिकारी है। आदेश में आरोपी के जमानत बंधपत्र और जमानतनामे निरस्त करने तथा प्रतिभुओं को दायित्व से मुक्त करने का निर्देश भी दिया गया। साथ ही, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437-क के अनुपालन में एक सप्ताह के भीतर बंधपत्र और प्रतिभू प्रस्तुत करने को कहा गया।
यह फैसला एक बार फिर रेखांकित करता है कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन का दायित्व केवल आरोप लगाने या बरामदगी का दावा करने तक सीमित नहीं है। दोषसिद्धि के लिए साक्ष्यों की विश्वसनीयता, बरामद माल की विधिवत प्रस्तुति और घटनाक्रम की निरंतरता महत्वपूर्ण होती है। जब इन पहलुओं पर गंभीर संदेह बना रहता है और अभियोजन आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित नहीं कर पाता, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।









