26 साल पुराने फिरौती के लिए अपहरण, हत्या कांड में सजा-ए-मौत

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अदालत बोली- धन का मूल्य मानव जीवन से अधिक नहीं हो सकता

मुजफ्फरनगर। करीब 26 वर्ष पुराने बहुचर्चित फिरौती के लिए अपहरण और हत्या के मामले में अतिरिक्त जिला व सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट-3) मुजफ्फरनगर,रवि कुमार दिवाकर ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी शाहनवाज को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि “धन का मूल्य कभी भी मानव जीवन से अधिक नहीं हो सकता।” फिरौती के लिए किसी निर्दोष व्यक्ति का अपहरण कर उसकी हत्या करना सभ्य समाज के विरुद्ध सबसे जघन्य अपराधों में से एक है और ऐसे मामलों में कठोरतम दंड ही न्याय के उद्देश्य को पूरा कर सकता है।
न्यायमूर्ति रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी व्यक्ति का जीवन केवल धन प्राप्त करने के उद्देश्य से समाप्त कर दिया जाता है, तब अपराध केवल एक व्यक्ति की हत्या तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह मानवता, कानून के शासन और समाज के नैतिक मूल्यों पर सीधा प्रहार बन जाता है। न्यायालय ने इस मामले को “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” श्रेणी में रखते हुए मृत्युदंड को न्यायोचित ठहराया।

अभियोजन अनुसार 9 दिसंबर 1999 को मुजफ्फरनगर छपार क्षेत्र निवासी किसान सलीम अपने बेटे हारून तथा दो अन्य रिश्तेदारों के साथ पॉपलर की लकड़ी बेचने के लिए हरिद्वार जा रहे थे। रास्ते में हथियारबंद बदमाशों ने उन्हें रोक लिया और हारून का अपहरण कर लिया। बाद में सलीम को बुलाकर पांच लाख रुपये की फिरौती की मांग की गई।
19 जनवरी 2000 को सलीम अपने रिश्तेदार इलियास के साथ आरोपियों के बताए स्थान पर पहुंचा, लेकिन फिरौती की रकम का इंतजाम नहीं हो सका। इसके बाद आरोपियों ने सलीम की हत्या कर दी और शव हरिद्वार के लक्सर क्षेत्र में फेंक दिया। कुछ दिन बाद पुलिस ने शव बरामद किया, जबकि अपहृत हारून को बाद में सकुशल मुक्त करा लिया गया। जांच के दौरान शाहनवाज की भूमिका सामने आने पर उसे गिरफ्तार किया गया और उसके विरुद्ध अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि दोषी शाहनवाज का लंबा आपराधिक इतिहास रहा है। उसके विरुद्ध हत्या, लूट, अपहरण, डकैती, गैंगस्टर एक्ट सहित 26 आपराधिक मामले दर्ज हैं। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि वह वर्ष 2001 के अपहरण तथा वर्ष 2009 के हत्या के मामले में पहले ही आजीवन कारावास की सजा पा चुका है। इसके बावजूद उसकी आपराधिक गतिविधियां समाज के लिए गंभीर खतरा बनी रहीं।
अदालत ने माना कि दोषी का आपराधिक चरित्र, अपराध करने का तरीका तथा समाज पर उसका प्रभाव यह दर्शाता है कि उसमें सुधार की संभावना अत्यंत कम है। इसलिए समाज की सुरक्षा और न्याय के हित में मृत्युदंड उचित दंड है।

फैसले में न्यायालय ने कहा कि जब कोई व्यक्ति लालच और धन के लिए किसी निर्दोष की जान लेता है तो वह केवल एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज की नैतिक व्यवस्था को चोट पहुंचाता है। किसी व्यक्ति का जीवन धन या संपत्ति से कहीं अधिक मूल्यवान है और उसकी हत्या किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती।
अदालत ने कहा कि यदि ऐसे अपराधों में उदारता दिखाई गई तो यह कानून के शासन और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। इसलिए न्यायालय का दायित्व है कि वह ऐसे अपराधों के प्रति कठोर संदेश दे।

26 वर्ष तक चला मुकदमा

अदालत ने मुकदमे के 26 वर्ष तक लंबित रहने पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने कहा कि न्याय मिलने में अत्यधिक विलंब न्याय प्रणाली पर जनता के विश्वास को कमजोर करता है। अदालत ने टिप्पणी की कि न्यायिक अधिकारियों के बार-बार स्थानांतरण, लंबित मामलों का बढ़ता बोझ और पर्याप्त न्यायिक संसाधनों की कमी जैसी समस्याओं के समाधान के लिए व्यापक सुधार आवश्यक हैं।
अदालत ने सुझाव दिया कि गंभीर आपराधिक मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए न्यायालयों में पर्याप्त संख्या में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की जाए तथा अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं को समाप्त किया जाए, जिससे पीड़ित परिवारों को समय पर न्याय मिल सके।

न्यायालय का यह फैसला केवल एक दोषी को सजा देने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह संगठित अपराध, फिरौती के लिए अपहरण और हत्या जैसे जघन्य अपराधों के खिलाफ न्यायपालिका का कड़ा संदेश भी है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि आर्थिक लाभ के लिए किसी निर्दोष की हत्या करने वालों के लिए कानून में किसी प्रकार की नरमी की कोई गुंजाइश नहीं है और ऐसे अपराधियों को कठोरतम दंड देकर ही समाज में कानून का सम्मान और जनता का विश्वास कायम रखा जा सकता है।

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