सतगुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती एवं माँ अमृत प्रिया ने माला दीक्षा, आशीर्वचन और प्रसाद वितरण के साथ किया समापन
पवन सचदेवा
सोनीपत।श्री रजनीश ध्यान मंदिर, कुमाशपुर-दीपालपुर रोड, सोनीपत में गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में आयोजित सप्ताहव्यापी आध्यात्मिक उत्सव का शनिवार, 1 अगस्त को सतगुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी एवं माँ अमृत प्रिया जी के दिव्य आशीर्वचनों, माला दीक्षा तथा प्रसाद वितरण के साथ भावपूर्ण समापन हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित साधकों ने गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त की।

ज्ञात हो कि गुरु पूर्णिमा उत्सव का शुभारंभ 26 जुलाई को एक दिवसीय ध्यान शिविर से हुआ था। इसके बाद सोमवार से शनिवार तक ‘भक्ति सूत्र उपासना समाधि शिविर’ का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न स्थानों से आए लगभग 125 साधकों ने सक्रिय रूप से भाग लेकर ध्यान, भक्ति और आत्मचिंतन की साधना की।

आश्रम से स्वामी प्रेम अद्वैत ने बताया कि इस शिविर की दैनिक दिनचर्या अत्यंत अनुशासित एवं ध्यानमय रही। प्रतिदिन प्रातः शिष्यों के सतगुरु के साथ चक्रमण के उपरांत सुबह 7:15 से 9:00 बजे तक सक्रिय ध्यान का प्रथम सत्र आयोजित किया जाता था। इसके बाद 10:00 से 11:45 बजे तक दूसरा, 12:15 से 2:00 बजे तक तीसरा तथा सायं 4:00 से 5:45 बजे तक चौथा साधना सत्र आयोजित हुआ। प्रतिदिन सायंकाल 6:45 से 8:30 बजे तक भजन-कीर्तन एवं ध्यानमय संध्या का आयोजन किया गया। वहीं रात्रि भोजन के उपरांत 9:30 से 10:15 बजे तक सतगुरु एवं शिष्यों की आत्मीय बैठक होती थी, जिसमें आध्यात्मिक चर्चा के साथ चुटकुलों, गीत-संगीत और सहज संवाद का आनंदमय वातावरण बना रहता था।

शिविर के विभिन्न गहन साधना सत्रों का संचालन सतगुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी एवं गुरु माँ अमृत प्रिया जी ने स्वयं किया। इसके अतिरिक्त उनके मार्गदर्शन में सह-आचार्य मस्तो बाबा, माँ मोक्ष संगीत, माँ आस्था तथा स्वामी प्रेम अद्वैत ने भी साधकों को ध्यान, भक्ति और आंतरिक जागरण की विभिन्न विधियों का अभ्यास कराया।

समापन अवसर पर सतगुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल गुरु के पूजन का दिवस नहीं, बल्कि उस दिव्य चेतना के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है जिसने हमारे भीतर सुप्त प्रकाश को जागृत किया है। गुरु एक ऐसे दर्पण हैं जिनमें साधक पहली बार अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन करता है। गुरु माँ अमृत प्रिया ने कहा कि गुरु हमें केवल अंधकार से प्रकाश की ओर नहीं ले जाते, बल्कि यह अनुभूति भी कराते हैं कि वह प्रकाश सदैव हमारे ही भीतर विद्यमान था।

स्वामी प्रेम अद्वैत ने कहा कि गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा और कृतज्ञता का अर्थ बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर जागरूकता, प्रेम और ध्यान की ज्योति को प्रज्वलित कर उसे जीवन का आधार बनाना है। उन्होंने कामना व्यक्त की कि पूज्य सतगुरुओं की दिव्य उपस्थिति सभी साधकों के जीवन में सदा जागृति, प्रेम, करुणा और उत्सव का अखंड प्रकाश भरती रहे।
इस अवसर पर ओशो के संदेश को भी स्मरण किया गया -“अपने भीतर लौटो, क्योंकि परम गुरु तुम्हारी अपनी चेतना है।” इसी संदेश के साथ सप्ताहभर चले गुरु पूर्णिमा उत्सव का समापन गहन आध्यात्मिक ऊर्जा, आनंद और उत्सवपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।














