Breaking News
आत्म-खोज की राह पर टेरेंस लुईस: नृत्य से ध्यान तक की अनोखी यात्रा संघर्ष से शिखर तक: टेरेंस लुईस ने समकालीन नृत्य को दी वैश्विक पहचान-मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से उठकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर टेलीग्रामसंवाद ईपेपर दिनांक :28 मार्च 2026 दिन: शनिवार बरेली पासपोर्ट कार्यालय को बम से उड़ाने की धमकी: हाई अलर्ट पर प्रशासन-ईमेल मिलते ही मचा हड़कंप, पुलिस ने खाली कराया पूरा परिसर मुठभेड़ में कानून का शिकंजा: 25 हजार का इनामिया गौकश गोली लगते ही हुआ ढेर, जिंदा गिरफ्तार – 15 मुकदमों का हिस्ट्रीशीटर, अवैध तमंचा बरामद उज्जवला गैस सिलेंडर बुकिंग 45 दिन बाद, पेट्रोलियम कंपनियों ने जारी किया फरमान-डीबीसी 35 और सीबीसी 25 गैस आपूर्ति में अंतराल अनिवार्य

आत्म-खोज की राह पर टेरेंस लुईस: नृत्य से ध्यान तक की अनोखी यात्रा

पवन सचदेवा

टेलीग्राम संवाद, सोनीपत। चमकती रोशनी और ग्लैमर की दुनिया से निकलकर जब कोई कलाकार भीतर की शांति की तलाश करता है, तो उसकी यात्रा और भी गहरी हो जाती है। टेरेंस लुईस की कहानी कुछ ऐसी ही है—जहां नृत्य केवल पेशा नहीं, बल्कि आत्म-खोज का माध्यम बन गया। सोनीपत के श्री रजनीश ध्यान मंदिर में टेलीग्राम संवाद के संपादक (एनसीआर) पवन सचदेवा से हुई विशेष बातचीत में लुईस ने अपने संघर्ष, करियर के उतार-चढ़ाव और आध्यात्म की ओर बढ़ते कदमों पर खुलकर बात की, साथ ही बताया कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ‘खुद से जुड़ना’ क्यों सबसे जरूरी है।

टेरेंस बताते हैं, मैं युवावस्था में बहुत धार्मिक था। मेरे माता-पिता भी काफी धार्मिक थे, इसलिए मैं भी अपने धर्म से गहराई से जुड़ा हुआ था। लेकिन मेरे अंदर हमेशा कई सवाल उठते थे, जिनके जवाब मुझे नहीं मिलते थे।” इन्हीं सवालों की खोज उन्हें सेंट जेवियर्स कॉलेज तक ले गई, जहां एक समृद्ध पुस्तकालय ने इस जीवन मे उनके लिए नए द्वार खोले। वे कहते हैं कि वहीं उन्होंने दर्शनशास्त्र की किताबें पढ़नी शुरू कीं और इसी दौरान ओशो की विचारधारा से उनका परिचय हुआ। वे याद करते हैं, “17–18 साल की उम्र में मैं बहुत कन्फ्यूज था –मैं कौन हूं, मेरी सोच अलग क्यों है, मैं हर चीज़ से टकराता क्यों हूं, धर्म हमें डराता क्यों है। उस समय मैं एक तरह के ‘कैओस’ में जी रहा था। ओशो की किताबों ने मुझे संभाला और मेरे कई सवालों के जवाब दिए।

आध्यात्म कोई मानने की चीज़ नहीं, अनुभव करने की प्रक्रिया है

टेरेंस के अनुसार, ओशो की एक बात ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया–खुद खोजो, खुद अनुभव करो, किसी बात को आंख बंद करके मत मानो। वे कहते हैं कि उनके लिए आध्यात्म कोई कल्पनात्मक या रोमांटिक विचार नहीं है, बल्कि यह स्वयं को समझने की एक गहरी और सच्ची प्रक्रिया है। हालांकि उस समय पढ़ाई और करियर के कारण वे आध्यात्म में पूरी तरह नहीं उतर सके, लेकिन यह अनुभव उनके भीतर कहीं स्थायी रूप से बना रहा। बाद में जब उन्हें पुणे स्थित ओशो आश्रम के बारे में पता चला, तो वे वहां कई बार गए और ध्यान व योग के विभिन्न कोर्स भी किए।

काम में डूबना भी एक तरह की साधना है

टेरेंस बताते हैं कि इसके बाद लगभग 10 से 15 वर्षों तक वे पूरी तरह अपने काम में समर्पित रहे। मैंने अपने काम को ही अपनी साधना बना लिया था, वे कहते हैं। ओशो भी कहते हैं कि हर व्यक्ति के लिए पारंपरिक ध्यान जरूरी नहीं होता, कभी-कभी अपने काम में पूरी तरह डूब जाना भी ध्यान का ही एक रूप है।

आध्यात्म की ओर वापसी, अपनी और मुड़ना
जब जीवन में आर्थिक स्थिरता आई, तब उन्होंने एक बार फिर आध्यात्म की ओर रुख किया। इसी दौरान उन्हें स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी के बारे में पता चला, जो ओशो के छोटे भाई हैं। वे कहते हैं, “यह जानकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मैंने उनके विचार सुने, माँ अमृत प्रिया जी के प्रवचन भी सुने और मुझे यह बहुत अच्छा लगा कि किस तरह वे ओशो की शिक्षाओं को आगे बढ़ा रहे हैं।

आज के समय में हमें ‘रीसेट’ की जरूरत है

टेरेंस मानते हैं कि आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी, खासकर मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में, व्यक्ति को खुद से दूर कर देती है। वे कहते हैं, हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि खुद से ही कट जाते हैं। ऐसे में ये जगहें आपको रुकने, देखने और खुद से जुड़ने का मौका देती हैं – एक तरह का ‘रीसेट’।

telegramsamvad
Author: telegramsamvad