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सम्बोधि दिवस पर साधना का उत्सव: ओशो फ्रैंग्रन्स आश्रम में ध्यान शिविर में उमड़ा आस्था का सैलाब-150 साधकों ने लिया भाग, “जागरण ही जीवन का उद्देश्य”—स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती नवरात्र में ‘जहर’ बनी कुट्टू की कचौड़ी: बरेली में एक ही परिवार के 6 लोग फूड प्वाइजनिंग का शिकार,अस्पताल में भर्ती-मिलावटखोरी का काला खेल उजागर, प्रशासन ने भरे सैंपल, जांच शुरू बरेली में पहली बार बड़े स्तर पर हुआ भ्रूण स्थानांतरणदेश -देश में बीएल एग्रो कामधेनु में पहली बार गिर गाय में एंब्रियो ट्रांसफर सफलता पूर्वक संचालित,बीएल एग्रो लीड्स जेनेटिक्स ने बदली डेयरी उद्योग की तस्वीर बिजली पूरी मिलती नहीं, कैसे चलें उद्योग- उद्यमी बोले- सप्लाई और बिलिंग संबंधी समस्या हल हो तभी लगाया जाए नया टैरिफ– बीएल एग्रो ने उठाया ओपन एक्सेस मामला, आयोग बोला- समाधान किया जाएगा बरेली में पत्नी, साला और सास पर हमला करने वाला आरोपी एनकाउंटर में ढेर, दो पुलिसकर्मी घायल टेलीग्रामसंवाद ईपेपर दिनांक :14 मार्च 2026 दिन: शनिवार

सम्बोधि दिवस पर साधना का उत्सव: ओशो फ्रैंग्रन्स आश्रम में ध्यान शिविर में उमड़ा आस्था का सैलाब-150 साधकों ने लिया भाग, “जागरण ही जीवन का उद्देश्य”—स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती

पवन सचदेवा

टेलीग्राम संवाद, सोनीपत। ओशो के सम्बोधि दिवस के अवसर पर श्री रजनीश ध्यान मंदिर, दीपालपुर (कुमाशपुर रोड), सोनीपत में विशेष ध्यान साधना शिविर/उत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आश्रम के संस्थापक स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी एवं संचालक माँ अमृत प्रिया के सान्निध्य में आयोजित, मस्तो बाबा व माँ मोक्षा द्वारा संचालित इस शिविर/उत्सव में देशभर से आए लगभग 150 साधकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

इस अवसर पर बोलते हुए ओशो अनुज स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने बताया कि ओशो का सम्बोधि दिवस मानव चेतना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण का स्मरण कराता है। यह वह दिन है जब एक साधारण मनुष्य, रजनीश, गहन ध्यान और आंतरिक खोज के माध्यम से ओशो में रूपांतरित हुआ, एक ऐसी चेतना में जो सीमाओं से परे, स्वतंत्र और पूर्णतः जागरूक है। यह दिवस केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए संभावनाओं का उत्सव है।

जब 21 मार्च 1953 को ओशो को सम्बोधि प्राप्त हुई उस समय वे मात्र 21 वर्ष के ही थे। यह घटना जबलपुर के एक बगीचे में, एक मौलश्री के वृक्ष के नीचे घटी। ओशो ने स्वयं इस अनुभव को शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा कि “उस क्षण में सब कुछ विलीन हो गया-मन, अहंकार, समय और केवल शुद्ध चेतना ही शेष रह गई।”

स्वामी जी ने कहाँ कि सम्बोधि का अर्थ है पूर्ण जागरण। यह कोई बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अस्तित्व के साथ एक गहरा एकत्व है। ओशो के अनुसार, हर मनुष्य के भीतर यह संभावना विद्यमान है, लेकिन हम अपने विचारों, मान्यताओं और सामाजिक कंडीशंनिंग में इतने उलझे होते हैं कि उस आंतरिक सत्य को पहचान नहीं पाते। ओशो का सम्पूर्ण जीवन इसी जागरण को साझा करने के लिए समर्पित रहा।

आयोजित शिविर के दौरान प्रातः एवं दोपहर के सत्रों में ओशो द्वारा विकसित ध्यान विधियों पर आधारित विशेष ध्यान प्रक्रियाओं का अभ्यास कराया गया। स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने ध्यान के माध्यम से आंतरिक ऊर्जा के जागरण और आत्मिक विकास के महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं माँ अमृत प्रिया व मस्तो बाबा ने साधकों को सजगता, प्रेम और समर्पण के साथ साधना करने के लिए प्रेरित किया।

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Author: telegramsamvad

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