ब्राज़ील सहयोग से पशुधन आनुवंशिकी क्षेत्र में बढ़ता भारत, लीड्स जेनेटिक्स ने 116 गायों में आईवीएफ कर 70% सफलता दर हासिल की
ब्राज़ील सहयोग से पशुधन आनुवंशिकी क्षेत्र में बढ़ता भारत
आर.बी. लाल
टेलीग्राम संवाद, बरेली। भारत में डेयरी उद्योग वर्षों से विश्व की सबसे बड़ी दुग्ध उत्पादक प्रणाली के रूप में जाना जाता है। अब तकनीकी और बायोजेनेटिक नवाचार एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है। उत्तर प्रदेश बरेली स्थित बीएल एग्रो समूह ने देश में पहली बार बड़े पैमाने पर स्वदेशी गायों में एम्ब्रियो ट्रांसफर (Embryo Transfer) कार्यक्रम सफलतापूर्वक संचालित कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। समूह ने अपनी सहयोगी कंपनी लीड्स जेनेटिक्स से मिलकर यह उपलब्धि प्राप्त की है। यह एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि भारतीय डेयरी सेक्टर की उत्पादकता, गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की दिशा में निर्णायक कदम मानी जा रही है।
IVF तकनीक क्षेत्र में 70% बड़ी छलांग
इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम के पहले चरण में, जो दिसंबर 2025 में आयोजित किया गया था, लीड्स जेनेटिक्स ने 116 गायों में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक का प्रयोग किया। इस प्रक्रिया में 70 प्रतिशत की सफलता दर हासिल हुई, जो न केवल भारतीय मानकों के हिसाब से, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्तर की सफलता दर यह संकेत देती है कि भारत अब केवल पारंपरिक डेयरी उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि अत्याधुनिक बायोजेनेटिक तकनीकों के उपयोग में तेजी से अग्रसर है।


दूसरा चरण: 160 गायों में सफल भ्रूण स्थानांतरण
पहले चरण की सफलता से उत्साहित कंपनी ने दूसरे चरण में और भी व्यापक स्तर पर कार्य किया। इस चरण में 160 गायों, जिनमें गिर, साहीवाल और एचएफ क्रॉस नस्लें शामिल थीं। इनमें सफलतापूर्वक भ्रूण स्थानांतरण किया गया। गिर नस्ल की गाय अपनी उच्च दूध उत्पादन क्षमता, अनुकूलनशीलता और रोग प्रतिरोधकता के लिए जानी जाती है, जो इस कार्यक्रम के केंद्र में रही। यह नस्ल न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अत्यधिक मांग में है।

डेयरी उत्पादकता में संभावित क्रांति
विशेषज्ञों का मानना है कि एम्ब्रियो ट्रांसफर तकनीक के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाले जीन वाली गायों की संख्या तेजी से बढ़ाई जा सकती है। इससे प्रति गाय दूध उत्पादन में तीन गुना तक वृद्धि संभव है। यह तकनीक विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तनकारी प्रभाव डाल सकती है। इस परियोजना की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है भारत और ब्राज़ील के बीच हुआ तकनीकी सहयोग। यह कार्यक्रम ब्राज़ील की प्रतिष्ठित कृषि अनुसंधान संस्था एम्ब्रापा (EMBRAPA),फजेन्डा फ्लोरेस्टा और लीड्स जेनेटिक्स बीच त्रिपक्षीय समझौता तहत संचालित किया गया। यह पहली बार है जब एम्ब्रापा ने भारत में किसी निजी कंपनी के साथ इस स्तर का समझौता किया है। यह साझेदारी भारत को पशुधन आनुवंशिकी और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

बीएल एग्रो: पारंपरिक व्यापार से बायोटेक नेतृत्व तक
बरेली स्थित बीएल एग्रो ग्रुप ने सरसों के पारंपरिक व्यापार से अपनी यात्रा शुरू की थी। आज यह समूह खाद्य उत्पाद, एग्री टेक, डेयरी नवाचार और पृथ्वी विज्ञान जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुका है। इसके प्रमुख ब्रांड बैल कोल्हू और नरिश देशभर में उपभोक्ताओं के बीच भरोसे का प्रतीक बन चुके हैं।
दो प्रमुख सहायक कंपनियां
- लीड्स जेनेटिक्स (पशु आनुवंशिकी और बायोटेक नवाचार) मिलकर एक समग्र एग्री-बिजनेस इकोसिस्टम तैयार कर रही हैं।
- लीड्स कनेक्ट सर्विसेज (डेटा और एग्री-टेक समाधान)

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
इस परियोजना का सबसे बड़ा प्रभाव ग्रामीण भारत में देखने को मिल सकता है। जहां एक ओर बेहतर नस्लों के पशु किसानों की आय बढ़ाएंगे, वहीं दूसरी ओर डेयरी सेक्टर में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
लीड्स जेनेटिक्स इस मॉडल को देशभर में विस्तार देने की योजना बना रही है। यदि यह कार्यक्रम बड़े स्तर पर लागू होता है, तो भारत न केवल अपनी घरेलू मांग को बेहतर ढंग से पूरा कर सकेगा, बल्कि वैश्विक डेयरी बाजार में भी अपनी मजबूत हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सकता है। भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर सफल एम्ब्रियो ट्रांसफर कार्यक्रम केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत है। यह पहल दर्शाती है कि जब पारंपरिक कृषि अनुभव को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ा जाता है, तो परिणाम केवल उत्पादन वृद्धि तक सीमित नहीं रहते, वे पूरे इकोसिस्टम को बदलने की क्षमता रखते हैं। बीएल एग्रो और लीड्स जेनेटिक्स की यह पहल आने वाले वर्षों में भारतीय डेयरी उद्योग की दिशा और दशा दोनों को बदल सकती है, और संभवतः भारत को वैश्विक डेयरी शक्ति के रूप में एक नई पहचान दिला सकती।

साहिवाल नस्ल की 5000 गायें रखने की योजना
भविष्य में गिर, साहिवाल नस्ल की पांच हजार देसी गायों को रखे जाने की योजना है, जो एक दिन में 40 से 35 लीटर तक दूध दे सके। इन गायों के माध्यम से बीएल एग्रो स्थानीय समुदाय को जहां उच्च दूध देने वाली गायों की उपलब्धता बढ़ाएगा, वहीं, बेहतरीन गुणवत्ता वाला चारा-दाना के माध्यम से जुड़कर पशुधन का विकास करेगा। साथ ही किसानों के लिए दूध की मार्केटिंग में भी सहयोग करेंगे। इसके लिए एक फील्ड प्रोसेसिंग यूनिट भी होगी, जो किसानों से दूध जैसे कच्चे माल की प्राप्ति के लिए उनके साथ काम करेगी। आईसीएआर-सीआईआरजी के पूर्व निदेशक व बीएल कामधेनु योजना उपाध्यक्ष डा. एसके अग्रवाल बताते हैं कि भ्रूण प्रत्यारोपण एक ऐसी विधि है, जिसके माध्यम से गाय की किसी भी नस्ल की एक गाय से साल भर में 40 से 50 भ्रूण विकसित करके दूसरी गायों में प्रत्यारोपित कर 15 से 16 बछिया को जन्म दिलाया जा सकता है, जबकि सामान्य तौर पर साल भर में एक गाय से एक ही बछिया प्राप्त की जा सकती है।
उन्नत नस्ल से किसान होंगे लाभान्वित
किसान या पशुपलाकों के पास उन्नत नस्ल का पशु है तो उसका भ्रूण लैब में तैयार करेंगे, जिसे उनके सेरोगेट मदर में ट्रांसफर करेंगे। वहीं, उनकी मांग पर लैब में संरक्षित भ्रूण को भी प्रत्यारोपित कर देंगे। इससे उन्नत नस्ल के पशु का जन्म होगा। टेस्ट ट्यूब बेबी (आईवीएफ) से जन्मे गाय के बच्चों में ज्यादा दूध देने की क्षमता होगी।

देसी गाय दूध का बड़ा बाजार
यूं तो राज्य सरकार की योजनाओं के बल पर गोवंश का संरक्षण करने के लिए हर जिले में गौशालाएं खोली जा रही हैं। विभिन्न योजनाओं के जरिये सरकार खूब रकम सब्सिडी के रूप में लोगों को उपलब्ध करा रही है और योजनाओं से पोषित गौशालाएं खुल भी रही हैं, पर बिना सरकारी सहयोग के ही बरेली में गुजरात की देसी गाय गिर अपने दूध व दुग्ध उत्पाद से नई पहचान बना रही है। इसके दूध की इतनी मांग है कि पूरी नहीं पड़ रही है। इससे संभावना जताई जा रही है कि आने वाले समय में अगर बरेली में और गौशालाएं खुलेंगी, तो दुग्ध व इसके उत्पाद के बाजार में छा जाएंगी।

कामधेनु परियोजना से किसान होंगे समृद्ध: आशीष खंडेलवाल
बीएल एग्रो कामधेनु परियोजना से गांवों और किसानों को समृद्ध करने की दिशा में काम कर रहा है। परियोजना का उद्देश्य डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए यहां गिर और साहिवाल गायों की नस्ल तैयार करना है, जो उच्च गुणवत्ता वाले दूध का उत्पादन करेंगी। बीएल एग्रो ने इस परियोजना के लिए शुरुआत में 1,000 करोड़ रुपये का निवेश किया है, जिसके पूरी क्षमता से चालू होने पर कुल 3,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है।वर्तमान में कुल 700 साहिवाल, गिर, पुंगुर नस्ल की गाय डेयरी में हैं। ब्राजील से सीमेन और भ्रूण लाकर इस नस्ल की गायों में अनुवांशिक सुधार कर उनकी संख्या बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। ब्राजील ने गिर नस्ल में अनुवांशिक सुधार करके प्रति पशु दूध उत्पादन 30 से 40 किलो प्रतिदिन प्राप्त किया है। भारत में प्रति पशु दूध का उत्पादन उन देशों के मुकाबले काफी कम है। इसका कारण हमारे पास उच्च गुणवत्ता वाले गायों और सांडों की कमी है। जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता को ध्यान में रखकर बीएल कामधेनु परियोजना में सम्मिलित किया है। योजना के प्रयास से उच्च नस्ल वाली भारतीय साहिवाल और गिर गाय पैदा होने के बाद सीमेन और भ्रूण लाने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने की भी आवश्यकता नहीं होगी- आशीष खंडेलवाल, प्रबंध निदेशक बीएल एग्रो










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