न्याय की चौखट पर पद नहीं, प्रमाण का सम्मान

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मुजफ्फरनगर। न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया कि भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी व्यक्ति का पद नहीं, बल्कि साक्ष्य और कानून सर्वोपरि हैं। तीन वर्ष पुराने जानलेवा हमले के मुकदमे में साक्ष्यों के अभाव में दो आरोपितों को दोषमुक्त करते हुए अदालत ने विवेचना की गंभीर खामियों पर कड़ी नाराजगी जताई है। इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक प्रवृत्ति बताया।
अपर जिला व सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) मुजफ्फरनगर रवि कुमार दिवाकर ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि यदि पुलिस निष्पक्ष विवेचना के बजाय निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फंसाने लगे तो यह न्याय व्यवस्था की नींव को कमजोर करता है। लोकतंत्र को ‘पुलिस स्टेट’ की ओर धकेलता है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि “न्याय की चौखट पर पद का नहीं, बल्कि प्रमाण का सम्मान होता है।”


अदालत ने विवेचक, तत्कालीन थाना प्रभारी (एसओ) तथा क्षेत्राधिकारी (सीओ) की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए उनके विरुद्ध विभागीय जांच की संस्तुति की है। इस संबंध में आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश अपर मुख्य सचिव (गृह) तथा संबंधित जिला वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को भेजी गई है, ताकि जांच कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।


मामला 16 अगस्त 2023 का है। आरोप के अनुसार बिहार से ट्रक लेकर बुलंदशहर जा रहे चालक गुलवीर शर्मा और क्लीनर मंजीत एक ढाबे पर रुके थे। इसी दौरान दो हमलावरों ने लूट के प्रयास में गोली चला दी, जिसमें चालक घायल हो गया। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर दो आरोपियों को गिरफ्तार किया और उनके विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया।


सुनवाई दौरान अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा। अदालत ने पाया कि विवेचना में कई गंभीर त्रुटियां थीं। पीड़ित और अन्य गवाह आरोपियों की पहचान नहीं कर सके। घटनास्थल से बरामदगी, वैज्ञानिक साक्ष्य और अन्य महत्वपूर्ण जांच प्रक्रियाओं में भी गंभीर कमियां सामने आईं। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य अभियुक्तों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।


फैसले में न्यायालय ने कहा कि पुलिस की वर्दी सत्य की रक्षा का प्रतीक है। यदि विवेचना तथ्यों के बजाय कल्पना और मनमानी पर आधारित होगी तो निर्दोष नागरिकों के मौलिक अधिकार प्रभावित होंगे और न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास कमजोर पड़ेगा। न्यायालय ने कहा कि अदालत का दायित्व केवल दोषियों को सजा देना नहीं, बल्कि निर्दोषों की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है।


अदालत ने अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून का शासन तभी प्रभावी रह सकता है, जब पुलिस निष्पक्ष, वैज्ञानिक और पारदर्शी विवेचना करे। गिरफ्तारी और अभियोजन की शक्ति का उपयोग केवल ठोस साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए, अन्यथा इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब और कमजोर वर्ग पर पड़ता है।


न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के बाद दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। साथ ही पुलिस अधिकारियों को भविष्य में निष्पक्ष और विधिसम्मत विवेचना सुनिश्चित करने की नसीहत देते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने हेतु विवेचना की गुणवत्ता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।