जागो, क्योंकि यही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है-स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती
पवन सचदेवा
टेलीग्राम संवाद, सोनीपत। ओशो के सम्बोधि दिवस के अवसर पर श्री रजनीश ध्यान मंदिर, दीपालपुर (कुमाशपुर रोड), सोनीपत में विशेष ध्यान साधना शिविर/उत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आश्रम के संस्थापक स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी एवं संचालक माँ अमृत प्रिया के सान्निध्य में आयोजित, मस्तो बाबा व माँ मोक्षा द्वारा संचालित इस शिविर/उत्सव में देशभर से आए लगभग 150 साधकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

इस अवसर पर बोलते हुए ओशो अनुज स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने बताया कि ओशो का सम्बोधि दिवस मानव चेतना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण का स्मरण कराता है। यह वह दिन है जब एक साधारण मनुष्य, रजनीश, गहन ध्यान और आंतरिक खोज के माध्यम से ओशो में रूपांतरित हुआ, एक ऐसी चेतना में जो सीमाओं से परे, स्वतंत्र और पूर्णतः जागरूक है। यह दिवस केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए संभावनाओं का उत्सव है।

जब 21 मार्च 1953 को ओशो को सम्बोधि प्राप्त हुई उस समय वे मात्र 21 वर्ष के ही थे। यह घटना जबलपुर के एक बगीचे में, एक मौलश्री के वृक्ष के नीचे घटी। ओशो ने स्वयं इस अनुभव को शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा कि “उस क्षण में सब कुछ विलीन हो गया-मन, अहंकार, समय और केवल शुद्ध चेतना ही शेष रह गई।”
स्वामी जी ने कहाँ कि सम्बोधि का अर्थ है पूर्ण जागरण। यह कोई बौद्धिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अस्तित्व के साथ एक गहरा एकत्व है। ओशो के अनुसार, हर मनुष्य के भीतर यह संभावना विद्यमान है, लेकिन हम अपने विचारों, मान्यताओं और सामाजिक कंडीशंनिंग में इतने उलझे होते हैं कि उस आंतरिक सत्य को पहचान नहीं पाते। ओशो का सम्पूर्ण जीवन इसी जागरण को साझा करने के लिए समर्पित रहा।


स्वामी जी ने कहा कि ओशो का सम्बोधि दिवस हमें यह स्मरण दिलाता है कि जागरण कोई दूर की चीज नहीं है। यह यहीं और अभी संभव है। ओशो कहते हैं–“तुम वही हो जिसे तुम खोज रहे हो।” इस वाक्य में सम्पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का सार छिपा है।
आज के युग में, जहाँ मनुष्य बाहरी उपलब्धियों में उलझा हुआ है, ओशो का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। सम्बोधि दिवस हमें भीतर की यात्रा पर जाने के लिए प्रेरित करता है एक ऐसी यात्रा जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से मिलाती है।
अंततः ओशो का सम्बोधि दिवस केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक निमंत्रण है अपने भीतर झांकने का, जागने का, और जीवन को पूर्णता के साथ जीने का।

आयोजित शिविर के दौरान प्रातः एवं दोपहर के सत्रों में ओशो द्वारा विकसित ध्यान विधियों पर आधारित विशेष ध्यान प्रक्रियाओं का अभ्यास कराया गया। स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने ध्यान के माध्यम से आंतरिक ऊर्जा के जागरण और आत्मिक विकास के महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं माँ अमृत प्रिया व मस्तो बाबा ने साधकों को सजगता, प्रेम और समर्पण के साथ साधना करने के लिए प्रेरित किया।
“स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने बताया कि ऐसे आध्यात्मिक आयोजनों का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को आंतरिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और जीवन में संतुलन की दिशा में अग्रसर करना है। उन्होंने कहा कि सम्बोधि केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर मौजूद जागरण की संभावना का प्रतीक है।शिविर में शामिल साधकों ने इस अनुभव को आत्मिक उन्नति और आनंद से भरपूर बताते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन उन्हें जीवन की वास्तविकता से जोड़ते हैं और भीतर की यात्रा के लिए प्रेरित करते हैं।ओशो के सम्बोधि दिवस के अवसर पर आश्रम में खूब सुन्दर व आध्यात्मिक वातावरण बना रहा और साधकों ने ध्यान, मौन एवं आत्मचिंतन के माध्यम से इस दिवस को सार्थक रूप से मनाया।”









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