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बरेली। मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को नियंत्रित करना आज भी भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती है। ऐसे परिदृश्य में सिजेरियन डिलीवरी (सी-सेक्शन) की बढ़ती दर, उसकी आवश्यकता और उसकी तकनीकी शुद्धता—तीनों पर एक साथ विमर्श जरूरी हो जाता है। इसी संदर्भ में बरेली ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटी ने रविवार को रुहेलखंड मेडिकल कॉलेज में सिजेरियन डिलीवरी की आधुनिक और मानकीकृत तकनीकों पर एक व्यापक कार्यशाला आयोजित की। यह कार्यक्रम यूपीसीओजी के सहयोग से संपन्न हुआ।
कार्यशाला का मूल उद्देश्य केवल सर्जिकल तकनीक का प्रशिक्षण भर नहीं था, बल्कि प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं को कम करते हुए सुरक्षित मातृत्व की दिशा में एक साझा चिकित्सा दृष्टिकोण विकसित करना भी था।
मानकीकरण पर जोर: क्यों जरूरी है एक समान सर्जिकल प्रोटोकॉल
कार्यक्रम का उद्घाटन संस्था की अध्यक्ष डॉ. लतिका अग्रवाल और सचिव डॉ. अनीता नाथ के निर्देशन में हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. सरोज सिंह (अध्यक्ष, यूपीसीओजी) और उपाध्यक्ष डॉ. साधना गुप्ता ने सत्र का शुभारंभ किया। संरक्षक डॉ. लता अग्रवाल ने अतिथियों का स्वागत किया।
अपने मुख्य व्याख्यान में डॉ. सरोज सिंह ने “स्टैंडर्डाइजेशन ऑफ सिजेरियन सेक्शन” विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिजेरियन अब केवल एक आपातकालीन प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि कई परिस्थितियों में नियोजित शल्य क्रिया के रूप में भी अपनाई जा रही है। ऐसे में हर अस्पताल और हर सर्जन के लिए एक समान मानक प्रोटोकॉल का पालन अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि सर्जरी के दौरान चीरे की तकनीक, टांकों का चयन, रक्तस्राव नियंत्रण और संक्रमण से बचाव—इन सभी में वैज्ञानिक मानकों का पालन मातृ जटिलताओं को उल्लेखनीय रूप से कम कर सकता है।

ऑपरेशन पूर्व तैयारी और जटिलताओं की रोकथाम
डॉ. साधना गुप्ता ने अपने सत्र में ऑपरेशन से पूर्व की तैयारी (Pre-operative preparedness) पर विशेष जोर दिया। उन्होंने बताया कि कई जटिलताएं सर्जरी के दौरान नहीं, बल्कि तैयारी की कमी के कारण उत्पन्न होती हैं।
उन्होंने एनीमिया की पहचान, रक्त की उपलब्धता, संक्रमण नियंत्रण, एनेस्थीसिया मूल्यांकन और उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पूर्व पहचान को अनिवार्य बताया। उनका कहना था कि सी-सेक्शन की सफलता केवल ऑपरेशन थिएटर में नहीं, बल्कि उससे पहले की तैयारी में निहित है।
सिजेरियन ऑडिट: आंकड़ों से सीखने की पहल
सम्मेलन के दौरान डॉ. भारती माहेश्वरी ने सिजेरियन ऑडिट पर शोध पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि अस्पताल स्तर पर नियमित सिजेरियन ऑडिट से यह स्पष्ट होता है कि किन परिस्थितियों में सर्जरी की दर अधिक है और किन मामलों में वैकल्पिक सामान्य प्रसव संभव था।
ऑपरेशन के बाद होने वाली जटिलताओं—जैसे संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव, थ्रोम्बोएम्बोलिज्म—के प्रबंधन पर भी विस्तृत चर्चा की गई। विशेषज्ञों का मत था कि पोस्ट-ऑपरेटिव मॉनिटरिंग और समय पर हस्तक्षेप से अधिकांश जटिलताओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
अत्यधिक रक्तस्राव रोकने की लाइव तकनीक
कार्यशाला का विशेष आकर्षण वीडियो सत्र रहा, जिसमें जटिल परिस्थितियों में रक्तस्राव नियंत्रण की तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। डॉ. सरोज सिंह ने कम्प्रेशन टांकों की विधि समझाई, जबकि डॉ. प्रियंका गर्ग ने “स्टेपवाइज डिवास्कुलराइजेशन” तकनीक के माध्यम से प्रसवोत्तर अत्यधिक रक्तस्राव (PPH) को नियंत्रित करने की प्रक्रिया का प्रदर्शन किया।
विशेषज्ञों ने बताया कि प्रसवोत्तर रक्तस्राव भारत में मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। ऐसे में इन उन्नत तकनीकों का प्रशिक्षण जीवनरक्षक साबित हो सकता है, खासकर उन केंद्रों में जहां संसाधन सीमित हैं।

बढ़ते मेडिकोलीगल मामलों पर खुली चर्चा
अंतिम सत्र में चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ते कानूनी मामलों पर खुला मंच आयोजित किया गया। डॉ. लतिका अग्रवाल ने कहा कि आज के समय में चिकित्सा निर्णय केवल नैदानिक दृष्टि से नहीं, बल्कि कानूनी संवेदनशीलता के साथ भी लेने पड़ते हैं।
उन्होंने दस्तावेजीकरण की शुद्धता, सूचित सहमति (Informed Consent) की स्पष्टता और पारदर्शी संवाद को चिकित्सकों की सुरक्षा का आधार बताया। विशेषज्ञों ने माना कि सिजेरियन से जुड़े मामलों में अपेक्षाओं और परिणामों के बीच असंतुलन अक्सर विवाद का कारण बनता है, जिसे बेहतर संचार से कम किया जा सकता है।
हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण से व्यावहारिक दक्षता
कार्यक्रम के समापन पर हैंड्स-ऑन वर्कशॉप आयोजित की गई, जिसमें प्रतिभागी चिकित्सकों को व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। यह सत्र विशेष रूप से युवा स्त्रीरोग विशेषज्ञों के लिए उपयोगी रहा, जहां उन्हें प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के साथ तकनीकी बारीकियां समझने का अवसर मिला।
इस अवसर पर डॉ. रश्मि शर्मा, डॉ. अनुजा सिंह, डॉ. दरख्शां अब्बास, डॉ. आशु सक्सेना और डॉ. नीला सिंह सहित अनेक चिकित्सक उपस्थित रहीं।
सुरक्षित सर्जरी ही सुरक्षित मातृत्व की कुंजी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे देश में, जहां संस्थागत प्रसव की दर बढ़ रही है, वहां सिजेरियन डिलीवरी की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। बरेली में आयोजित यह कार्यशाला केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि सुरक्षित मातृत्व की दिशा में चिकित्सकीय प्रतिबद्धता का संकेत है।
यदि सर्जरी के मानकीकृत प्रोटोकॉल, निरंतर ऑडिट और व्यावहारिक प्रशिक्षण को नियमित अभ्यास का हिस्सा बनाया जाए, तो मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।












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