धूप में तड़पते मरीज, सिस्टम बना तमाशबीन-बरेली जिला अस्पताल में एक पर्चे के लिए घंटों जलते रहे बुजुर्ग और मासूम

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10 की जगह सिर्फ 3 काउंटरों पर चल रहा 25 लाख आबादी का इलाज

टेलीग्राम संवाद

बरेली। बरेली में स्थित महाराणा प्रताप राजकीय जिला अस्पताल इन दिनों खुद गंभीर “बीमारी” से जूझता नजर आ रहा है। जिस अस्पताल में मरीज राहत और इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहीं अब उन्हें सबसे पहले भीषण गर्मी, लंबी कतारों और प्रशासनिक लापरवाही की यातना से गुजरना पड़ रहा है। आसमान से बरसती आग और बड़ा तापमान के बीच ओपीडी का एक साधारण पर्चा बनवाने के लिए मरीजों को घंटों धूप में खड़ा रहने को मजबूर होना पड़ रहा है।
ग्राउंड जीरो पर हालात इतने बदतर दिखाई दिए कि अस्पताल परिसर में ओपीडी रजिस्ट्रेशन काउंटर के बाहर मरीजों को धूप से बचाने के लिए न तो टिन शेड की व्यवस्था है और न ही किसी अस्थायी शामियाने की। तपती जमीन, सिर पर चिलचिलाती धूप और लंबी कतारों के बीच महिलाएं, बुजुर्ग और मासूम बच्चे अपनी बारी का इंतजार करते नजर आए। अस्पताल प्रशासन की यह संवेदनहीनता उन तमाम दावों पर सवाल खड़े कर रही है, जिनमें सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा किया जाता है।


विडंबना यह है कि एक ओर डॉक्टर लोगों को लू और धूप से बचने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल में इलाज लेने आए लोग खुद धूप की मार से और अधिक बीमार पड़ने को मजबूर हैं। पर्चा काउंटर के बाहर लाइन में खड़ी एक महिला ने नम आंखों से बताया कि वह अपने बीमार बच्चे की दवा के लिए आधे घंटे से ज्यादा समय से लाइन में लगी हुई है। धूप इतनी तेज है कि खड़ा रहना मुश्किल हो रहा है, लेकिन अब तक उसका पर्चा तक नहीं बन पाया। महिला के चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी।
स्थानीय निवासी विशाल सक्सेना ने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर तीखा आक्रोश जताते हुए कहा कि वह अपने बुजुर्ग पिता और बड़े भाई को लेकर अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन यहां वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग लाइन तक की व्यवस्था नहीं है। बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और गंभीर मरीज — सभी को एक ही कतार में धूप में खड़ा होना पड़ रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सरकार द्वारा दी गई सुविधाएं जमीन पर क्यों दिखाई नहीं देतीं।
घुटनों के दर्द से पीड़ित अपनी बुजुर्ग मां की दवाई लेने पहुंचीं बबीता नाम की महिला अस्पताल की अव्यवस्था से बेहद परेशान दिखीं। उन्होंने बताया कि पहले उन्हें दूसरे काउंटर पर भेजा गया, जहां पर्चा नहीं बन सका। अब वह पिछले एक घंटे से दूसरी लाइन में खड़ी हैं, जबकि उनकी मां दर्द के कारण खड़े होने की हालत में भी नहीं हैं।
वहीं अस्पताल में मौजूद अमान नाम के युवक ने बताया कि वह पिछले डेढ़ घंटे से कतार में खड़े हैं, लेकिन लाइन हर 10 से 15 मिनट में केवल दो-चार कदम ही आगे बढ़ती है। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि अस्पताल प्रशासन मरीजों के लिए कम से कम एक टेंट या अस्थायी शेड तक की व्यवस्था नहीं कर पाया। सबसे चिंताजनक स्थिति उन बच्चों की है, जो पहले से तेज बुखार, निमोनिया और अन्य बीमारियों से जूझ रहे हैं और उन्हें इस जानलेवा धूप में घंटों खड़ा रहना पड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार की ओर से जिला अस्पताल में मरीजों की सुविधा के लिए 10 पर्चा काउंटर स्वीकृत किए गए हैं, लेकिन अस्पताल प्रशासन की मनमानी के चलते महज तीन काउंटरों के सहारे ही करीब 25 लाख की आबादी का इलाज चलाया जा रहा है। यही कारण है कि अस्पताल के बाहर रोज अफरा-तफरी और अव्यवस्था का मंजर देखने को मिलता है।
हैरानी की बात यह भी है कि समय-समय पर निरीक्षण करने पहुंचने वाले अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी सिर्फ औपचारिकता निभाकर लौट जाते हैं। जमीन पर मरीजों की पीड़ा और व्यवस्थाओं की सच्चाई शायद उनकी फाइलों तक नहीं पहुंच पाती।
फिलहाल बरेली का राजकीय जिला अस्पताल खुद “आईसीयू” जैसी स्थिति में दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन मरीजों को इस तपती यातना से राहत दिलाने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा या फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की यह बदहाली यूं ही लोगों की सांसों और उम्मीदों को झुलसाती रहेगी।

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