बशीर बद्र ने शायरी के कठिन आवरण को तोड़कर जन-जन तक पहुँचाया: डॉ. कुमार विश्वास

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टेलीग्राम संवाद

भोपाल। आदरणीय बशीर बद्र साहब से एक श्रोता के रूप में तो लगभग तीन दशकों से भी अधिक का संपर्क था, क्योंकि प्रारम्भ से ही जीवन में कविता, साहित्य और शायरी आदि का प्रवेश होने के कारण उनके जो बहुत मकबूल शेर थे, वे सब हमारे पास तक पहुँचे। लेकिन जब मैं कवि सम्मेलनों के मंचों पर आया, तो उस समय भी मुशायरों और कवि सम्मेलनों के बड़े-बड़े लोकप्रिय कवि और शायर थे और चूँकि वे मेरठ में थे, तो हमारे लिए विशेष रूप से गौरव-बोध था कि वे हमारे क्षेत्र में हैं, हमारे क्षेत्र के हैं। उनसे शुरुआत में ही परिचय हो गया और उनके प्रशंसक के तौर पर मैंने बहुत समय उनके साथ बिताया। साथी कवि के तौर पर उनके साथ बहुत सारे आयोजन किए। संयोजक के रूप में उन्हें कई बार बुलाने का, उन्हें प्रणाम करने का अवसर मिला। बीच में एक अप्रिय परिस्थिति में उन्होंने मेरठ छोड़कर भोपाल में अपना आशियाना बनाया। भोपाल में जब-जब हम गए, तब-तब उन्हें प्रणाम करने का अवसर मिला और उन्हें मंच से स्मरण भी करते रहे। उनकी बीमारी के दिनों में शुभकामनाएँ देते रहे।
बशीर बद्र जी का सबसे बड़ा योगदान यह है कि आज़ादी के बाद के जो शायर जनता की जिह्वा पर और स्मृति पर काबिज हुए, जिन्होंने अपने कहन की सरलता और चमत्कारहीनता के बावजूद भी एक बड़ा चमत्कार कर देने का कौशल अर्जित किया, उनमें बशीर बद्र का नाम सबसे ऊपर रहा। उनका होना कामयाब मुशायरे की ज़मानत मानी जाती थी। अगर वे मंच पर हैं तो जहाँ वे खड़े होंगे, वहाँ मुशायरा कामयाब होगा। बहुत अधिक गायन में उनकी ग़ज़लें नहीं थीं, लेकिन उनके गायन की एक विशेष शैली थी। समकालीन जो लोग थे, उन्होंने उन्हें बहुत उद्धृत किया। विशेष रूप से भारतीय सिनेमा की एक बड़ी त्रासदी, एक बड़ी दुखांतिका जो मीना कुमारी के रूप में घटित हुई – तो वह शेर जो मीना कुमारी जी ने अपनी डायरी पर लिखा, जो आज भारत के हर कोने में लगभग ट्रकों के पीछे, ऑटो के पीछे, लोगों की बातचीत में, चलते समय अक्सर उद्धृत किया जाता है –
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’ यह बहुत लोकप्रिय हुआ। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में उनका एक शेर फ्रंट पेज पर छपा, दोनों राष्ट्राध्यक्षों के हाथ मिलाते हुए चित्र के साथ – ‘दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए।’ जब कभी किसी व्यक्ति से दुश्मनी हो जाए, नाराज़गी हो जाए, लेकिन आप वापस आने के लिए एक झरोखा भी न छोड़ें, उस अनिवार्यता के लिए उनका यह शेर बहुत मशहूर हुआ – ‘दुश्मनी जमकर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।’
ऐसे ही जीवन के सामान्य पहलुओं पर उनके बड़े प्रसिद्ध शेर हुए। मुझे आज भी याद है कि जब उनकी ग़ज़लों पर एक बड़ी किताब छपी थी, तो उन्होंने मुझसे एक कार्यक्रम में कहा कि “कुमार भाई, इस पर कुछ कह दीजिए, मैं इसे छपवाना चाहता हूँ।” मैं बहुत संकोच में पड़ गया कि इतने बड़े शायर के बारे में मैं, इतना सामान्य-सा कवि, क्या लिखूँगा? तो मैंने चार-पाँच पंक्तियाँ लिखीं, लेकिन उनमें एक पंक्ति ऐसी थी जिसके लिए उनका अलग से फ़ोन आया और उन्होंने कहा कि “कुमार भाई, आपने यह बात बहुत अच्छी कही।” और वही बात उन्होंने सदा याद रखी। जब भी मिलते, उसका उल्लेख करते।
उस समीक्षा में मैंने यह लिखा था कि बशीर बद्र ग़ज़ल के गौतम बुद्ध हैं – जो काम भगवान बुद्ध ने किया कि संस्कृत के प्रच्छन्न आवरण में ढके हुए धर्म और आध्यात्म को उन्होंने पालि, प्राकृत, अपभ्रंश जैसी लोकप्रचलित भाषाओं में अनुवाद करके जनता तक पहुंचाने के लिए सहज और गम्य बनाया, ऐसे ही बशीर बद्र साहब ने अपने कहन, अपने गायन, अपनी प्रस्तुति के माध्यम से बहुत बड़ी-बड़ी बातों को सहजता से प्रस्तुत कर दिया। और एक शायर या कवि की उत्तरजीविता यही है कि वो स्मृति में कितना जीवित है।
आज भी हमारी बोलचाल में जिन दो बड़े ग़ज़लकारों के शेर भारत की संसद में, विधानसभाओं में, सड़क पर, नारों में, बातचीत में, बहसों में, संगोष्ठियों में, सेमिनारों में, पत्रकारिता में गूँजते हैं, यह सौभाग्य है कि उन दोनों की कर्मभूमि भोपाल रही। यह भोपाल का बहुत सौभाग्य है, बड़ा आनंद आता है यह देखकर। एक स्वर्गीय दुष्यंत कुमार, जो हिंदी ग़ज़ल के पितामह कहे जाते हैं, जिनके शेर तो लगातार उद्धृत होते हैं, और बशीर बद्र साहब, जो उनके कहन हैं, वे हम सबके कहन में रच-बस गए। हम सब किसी न किसी को ऐसे मिलते-जुलते कपड़ों में देखकर कह उठते हैं- ‘ये ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है, कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे’ या ‘मैं भी एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे, तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना है।’
बशीर बद्र के जितने भी शेर हैं, वे सब जगह गूँजे। जैसे – ‘वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो’, ‘ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम, यहाँ से तेरे मिरे रास्ते बदलते हैं’, ‘मैं शाहराह नहीं रास्ते का पत्थर हूँ, यहाँ सवार भी पैदल उतर के चलते हैं’ मुझे तो उनके हज़ारों शेर और सैकड़ों ग़ज़लें कंठस्थ हैं, क्योंकि बहुत लंबा समय मैंने मंच पर उनके साथ बिताया और लगभग हर दूसरे-तीसरे कवि सम्मेलन-मुशायरे में वे होते थे। सबसे बड़ी बात यह है कि कवि सम्मेलनों में भी उनकी जो स्वीकृति थी, वह एक बड़े शायर की थी। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। वे पीएचडी थे, डॉक्टरेट थे, तो एक विशेष प्रकार की ‘प्रोेफेसराना’ विद्वत्ता और अदबी एहसास उनमें दिखता था। वो बहुत ही ज़हीन इंसान थे, बहुत सॉफ़्ट-स्पोकन, प्यार से बोलते थे।
मुझे एक संस्मरण याद है – भोपाल में एक मुशायरा हुआ था राजभवन में, जिसमें उस वक़्त के दो बड़े शायरों के बीच थोड़ी-सी बदमज़गी हो गई, जिनमें बशीर साहब भी थे। मैं उस कार्यक्रम की निज़ामत कर रहा था। लेकिन वहाँ भी मैंने देखा कि बशीर साहब ने बड़ी शाइस्तगी रखी, बड़ी तहज़ीब रखी और उन्होंने कोई ऐसा अप्रिय अवसर आमंत्रित नहीं होने दिया जिससे मामला बिगड़ता। बाद में भी जब वह बात आगे चली, तब भी बशीर बद्र साहब ने सदा उस विवाद का पटाक्षेप किया।
यह जो इतनी बड़ी क्षति उर्दू की, हिंदी की, भाषा की और भारत की सांस्कृतिक विरासत की हुई है, इसके प्रति मैं गहरा शोक व्यक्त करता हूँ। और विशेष रूप से डॉक्टर राहत बदर ने उनकी जो सेवा की, वह बहुत ही अविस्मरणीय है। वे जिस प्रकार से उन्हें सँभाले रहीं, एक दशक का वह समय बड़ा कष्टकर बीता, लेकिन वे सदा उनके साथ खड़ी रहीं। यह भी प्रेम की पराकाष्ठा है। मैं उन्हें भी हार्दिक सांत्वना प्रकट करता हूँ। और उनके करोड़ों चाहने वालों और सुनने वालों से मैं यही कहता हूँ कि बशीर बद्र साहब के लिए सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि उनका लेखन, उनका कृतित्व, हम सबके स्मरण में, हम सबके उल्लेखों में, हम सबके संदर्भों में और हमारे जीवन में बना रहे।
“मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी…।”

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