आकर्ष मिश्रा
टेलीग्राम संवाद, बरेली। बरेली की सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी। वन विभाग परिसर में हवा के साथ पेड़ों की पत्तियां सरसराहट कर रही थीं। दूर कहीं कोयल की आवाज सुनाई दे रही थी और परिसर में लगे पीपल और बरगद के वृक्ष मानो शहर को सांस दे रहे हों। इसी शांत वातावरण में हमारी मुलाकात हुई बरेली की प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) दीक्षा भंडारी से।
सरकारी दफ्तरों की सामान्य औपचारिकता से बिल्कुल अलग, यह बातचीत किसी प्रशासनिक इंटरव्यू से ज्यादा प्रकृति के भविष्य पर एक गंभीर संवाद जैसी थी। सामने बैठी अधिकारी के चेहरे पर पहाड़ों की सादगी थी और शब्दों में जंगलों की संवेदना। बातचीत शुरू हुई तो लगा जैसे उत्तराखंड की वादियां, इटावा सफारी के शेर, बरेली के मिनी फॉरेस्ट, तेंदुए के रेस्क्यू ऑपरेशन और जलवायु परिवर्तन की चेतावनियां एक साथ हमारे सामने जीवंत हो उठी हों।

सवाल: आपका बचपन पहाड़ों में बीता। क्या वहीं से प्रकृति के प्रति लगाव शुरू हुआ?
डीएफओ दीक्षा भंडारी: : बिल्कुल। मेरा बचपन उत्तरकाशी में बीता। वह इलाका सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि प्रकृति का जीवंत विद्यालय है। बचपन में हम जिस वातावरण में बड़े हुए, आज की पीढ़ी शायद उसे केवल तस्वीरों या वीडियो में देख पाती है। सुबह उठते ही पहाड़, देवदार के जंगल, नदियों की आवाज और साफ हवा… यही हमारी दुनिया थी।
मुझे आज भी याद है कि बरसात के दिनों में जंगलों की मिट्टी की खुशबू कितनी अलग होती थी। प्रकृति वहां जीवन का हिस्सा थी, कोई “विषय” नहीं। शायद इसी वजह से मन में हमेशा यह इच्छा रही कि जिंदगी में ऐसा काम करूं जो सीधे पर्यावरण और जंगलों से जुड़ा हो।
सवाल: भारतीय वन सेवा तक पहुंचने का सफर कितना कठिन रहा?
डीएफओ: हर प्रतियोगी परीक्षा कठिन होती है, लेकिन जब लक्ष्य दिल से जुड़ा हो तो संघर्ष बोझ नहीं लगता। मैंने विज्ञान विषयों से पढ़ाई की और बाद में फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) से एमएससी की। एफआरआई का माहौल बहुत प्रेरणादायक था। वहां देशभर के वन अधिकारियों से मिलने का अवसर मिला। उसी दौरान महसूस हुआ कि वन सेवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि प्रकृति के लिए जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है।
भारतीय वन सेवा में चयन से पहले मैंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट भोपाल और भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग में भी काम किया। फिर पहले प्रयास में भारतीय वन सेवा की परीक्षा पास की और उत्तर प्रदेश कैडर मिला।

सवाल: बरेली जैसे शहर को आप पर्यावरणीय दृष्टि से कैसे देखती हैं?
डीएफओ:बरेली बहुत खास है। यहां तराई और मैदानी भूभाग का अनोखा संगम है। यही कारण है कि यहां जैव विविधता काफी समृद्ध है। हिमालयी प्रभाव यहां की वनस्पति और जलवायु में साफ दिखाई देता है।
देखिए, जहां दो भौगोलिक परिस्थितियां मिलती हैं, वहां प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है। बरेली उसी का उदाहरण है। यहां पर्यावरण संरक्षण के लिए अपार संभावनाएं हैं, लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं।
सवाल: आज सबसे बड़ी चुनौती क्या है— जंगल बचाना या जलवायु परिवर्तन से लड़ना?
डीएफओ: अब दोनों चीजें एक-दूसरे से जुड़ चुकी हैं। पहले वन विभाग को लोग सिर्फ जंगल और वन्यजीवों तक सीमित समझते थे, लेकिन आज जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में वन विभाग की भूमिका बहुत बढ़ गई है।
आप देखिए… गर्मी लगातार बढ़ रही है। बारिश का पैटर्न बदल रहा है। मौसम अनिश्चित हो गया है। यह सिर्फ वैज्ञानिक रिपोर्ट नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाली सच्चाई है।
सबसे कठिन काम विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना है। सड़कें बनेंगी, शहर बढ़ेंगे, परियोजनाएं आएंगी… लेकिन सवाल यह है कि क्या हम विकास करते हुए प्रकृति को बचा पा रहे हैं?
सवाल: सड़क चौड़ीकरण में अक्सर पेड़ों की कटाई को लेकर विवाद होता है। वन विभाग इसे कैसे देखता है?
डीएफओ: हमारी कोशिश रहती है कि कम से कम पेड़ों को नुकसान पहुंचे। किसी भी परियोजना से पहले संयुक्त सर्वे होता है। जहां पेड़ बचाए जा सकते हैं, वहां डिजाइन में बदलाव तक किए जाते हैं।
लेकिन कई बार कटान अपरिहार्य हो जाता है। ऐसे में हमारा फोकस क्षतिपूरक वृक्षारोपण पर होता है। हम सिर्फ पौधे लगाने की औपचारिकता नहीं करते, बल्कि उनकी निगरानी भी करते हैं।
पेड़ लगाना आसान है… उन्हें बड़ा करना कठिन है।

सवाल: “ग्रीन बेल्ट” और “मिनी फॉरेस्ट” की चर्चा इन दिनों काफी हो रही है। बरेली में इसका कितना असर दिख रहा है?
डीएफओ: बहुत सकारात्मक असर है। बरेली-शाहजहांपुर मार्ग सहित कई जगहों पर ग्रीन बेल्ट विकसित की गई है। सड़क किनारे पौधारोपण से धूल और प्रदूषण कम होता है।
सीबीगंज क्षेत्र में “मिशन छाया” के तहत मिनी फॉरेस्ट तैयार किए गए। जब हमने यह शुरू किया था तब लोगों को लगा कि इतने छोटे क्षेत्र में जंगल जैसा वातावरण कैसे बनेगा। लेकिन आज वहां घना हरित क्षेत्र दिखाई देता है।
दरअसल, प्रकृति को मौका दीजिए… वह खुद चमत्कार करती है।
सवाल: आपने पीपल, बरगद और पाकड़ जैसे पारंपरिक वृक्षों पर ज्यादा जोर दिया है। इसकी खास वजह?
डीएफओ: ये सिर्फ पेड़ नहीं, पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षक हैं। पीपल और बरगद जैसे वृक्ष पक्षियों, गिलहरियों और कई छोटे जीवों को आश्रय देते हैं। उनकी छाया का तापमान आसपास के क्षेत्र को भी प्रभावित करता है।
आज शहरों में लोग “ग्रीनरी” चाहते हैं, लेकिन असली हरियाली वही है जो जैव विविधता को भी जीवित रखे।

सवाल: “वन रोड, वन स्पीशीज” योजना के पीछे क्या सोच थी?
डीएफओ: हम चाहते थे कि शहर का सौंदर्यीकरण भी हो और पर्यावरणीय लाभ भी मिले। इसलिए एक सड़क पर एक ही प्रकार के वृक्ष लगाए गए। कहीं गुलमोहर, कहीं महोगनी।
जब गुलमोहर फूलों से भरता है तो पूरी सड़क लाल रंग में बदल जाती है। यह सिर्फ सुंदरता नहीं बढ़ाता, बल्कि लोगों को प्रकृति से भावनात्मक रूप से जोड़ता भी है।
सवाल: क्या लोगों की सोच भी पर्यावरण संरक्षण में बाधा बनती है?
डीएफओ: यह सबसे बड़ी चुनौती है। कई लोग अपने घर या दुकान के सामने पेड़ नहीं चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि पत्ते गिरेंगे या बोर्ड छिप जाएगा।कुछ जगहों पर पौधों को नुकसान भी पहुंचाया जाता है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि पेड़ सिर्फ सरकार के नहीं होते, समाज के होते हैं।अगर समाज नहीं बदला तो सिर्फ सरकारी योजनाएं पर्यावरण नहीं बचा पाएंगी।
सवाल: वन्यजीव रेस्क्यू ऑपरेशन कितना जोखिम भरा होता है?
डीएफओ: बहुत ज्यादा। जब कोई तेंदुआ आबादी वाले इलाके में पहुंचता है तो सबसे पहले लोगों में डर फैलता है। लेकिन सच यह है कि जानवर खुद सबसे ज्यादा डरा हुआ होता है।रेस्क्यू के दौरान हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है कि न जनता को नुकसान पहुंचे और न जानवर घायल हो।सबसे कठिन स्थिति तब बनती है जब लोग वीडियो बनाने के लिए बहुत करीब पहुंच जाते हैं। भीड़ नियंत्रण कई बार जानवर से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
सवाल: इटावा सफारी पार्क का अनुभव कितना अलग रहा?
डीएफओ: बहुत विशेष। वहां शेरों को करीब से समझने का अवसर मिला। किताबों में जो पढ़ते हैं और वास्तविक व्यवहार में बहुत फर्क होता है।वन्यजीवों के साथ काम करते समय आपको धैर्य, मनोविज्ञान और संवेदनशीलता— तीनों की जरूरत होती है।

सवाल: प्लास्टिक आज सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। क्या सिर्फ सरकारी प्रतिबंध काफी हैं?
डीएफओ: नहीं। जब तक आदतें नहीं बदलेंगी, समस्या खत्म नहीं होगी। सड़क किनारे, पौधारोपण स्थलों और सार्वजनिक जगहों पर प्लास्टिक सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है।हम लोग अक्सर सोचते हैं कि “एक प्लास्टिक फेंकने से क्या होगा?” लेकिन करोड़ों लोगों की यही सोच मिलकर पर्यावरणीय संकट बन जाती है।
सवाल: आम नागरिक पर्यावरण बचाने के लिए रोजमर्रा में क्या कर सकते हैं?
डीएफओ: बहुत छोटी-छोटी चीजें बड़ा फर्क ला सकती हैं।अनावश्यक बिजली बंद करें।एसी से निकलने वाले पानी का उपयोग पौधों में करें।कार पूलिंग अपनाएं।कम दूरी के लिए पैदल चलें या साइकिल चलाएं।एकल उपयोग प्लास्टिक से बचें।पर्यावरण संरक्षण कोई “बड़ा प्रोजेक्ट” नहीं, बल्कि जीवनशैली है।
सवाल: तकनीक ने वन विभाग के काम को कितना बदला है?
डीएफओ: बहुत ज्यादा। आज कैमरा ट्रैप से वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। बरेली में तेंदुए की निगरानी में इसका बड़ा उपयोग हुआ।वनकर्मियों को “स्मार्ट स्टिक” दी गई हैं, जिनमें टॉर्च, सायरन और सिग्नलिंग सिस्टम जैसी सुविधाएं हैं। जंगलों के गेस्ट हाउसों में सोलर ऊर्जा का उपयोग बढ़ा है।
डिजिटल तकनीक ने रिस्पॉन्स टाइम काफी कम किया है।
सवाल: लेकिन तकनीक का गलत उपयोग भी खतरा बन रहा है?
डीएफओ: बिल्कुल। शिकारी अब तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। मोबाइल और इंटरनेट की मदद से वन्यजीवों की लोकेशन ट्रैक की जाती है।अवैध वन्यजीव व्यापार आज अंतरराष्ट्रीय अपराध बन चुका है। बरेली में भी तोतों और जंगली सूअरों के अवैध शिकार के मामलों में कार्रवाई हुई है।
सवाल: युवाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
डीएफओ: मैं संदेश नहीं, अपील करना चाहूंगी।आज की पीढ़ी के पास तकनीक है, जागरूकता है और ऊर्जा भी। अगर युवा सस्टेनेबल जीवनशैली अपनाएं तो बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है।
साइकिल चलाना फैशन बनना चाहिए। जरूरत से ज्यादा उपभोग कम होना चाहिए। प्रकृति को सिर्फ “वीकेंड डेस्टिनेशन” नहीं, जीवन का आधार समझना होगा।
सवाल: कभी ऐसा लगता है कि इतनी मेहनत के बावजूद लोग वन विभाग के काम को समझ नहीं पाते?
डीएफओ:(मुस्कुराते हुए) हां, कई बार लगता है कि यह “थैंकलेस जॉब” है।जब आंधी में पेड़ गिरते हैं तो हमारी टीमें पूरी रात सड़कें साफ करती हैं। जब तेंदुआ गांव में पहुंचता है तो वनकर्मी जान जोखिम में डालकर रेस्क्यू करते हैं।लेकिन जब कोई आम नागरिक कहता है— “अच्छा काम किया”… वही सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।

सवाल: अंत में… क्या आपको लगता है कि अभी भी समय बचा है?
डीएफओ: समय है… लेकिन बहुत ज्यादा नहीं।जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, वर्तमान की सच्चाई है। बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाएं चेतावनी हैं।अगर आज भी हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।पर्यावरण संरक्षण किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं। यह समाज, सरकार और हर नागरिक की साझी जिम्मेदारी है।
और सच कहूं…
अगर जंगल बचेंगे, तभी शहर सांस ले पाएंगे।
उस बातचीत के बाद जब हम वन विभाग परिसर से बाहर निकले तो सड़क किनारे लगे छोटे-छोटे पौधे अचानक सिर्फ पौधे नहीं लगे। वे आने वाले कल की उम्मीद जैसे दिखाई दे रहे थे।
बरेली की भागती सड़कों, बढ़ती आबादी और बदलते मौसम के बीच यह इंटरव्यू सिर्फ एक अधिकारी की बातचीत नहीं, बल्कि प्रकृति की ओर से दी गई चेतावनी भी था—
कि विकास जरूरी है, लेकिन सांस लेने के लिए पेड़ उससे भी ज्यादा जरूरी हैं।















