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बरेली।पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बढ़ती गर्मी और नमी के बीच आम और अमरूद के बागों पर कीटों का खतरा तेजी से मंडराने लगा है। मई से जुलाई के बीच फल मक्खी और कैटरपिलर/कटर कीट का प्रकोप किसानों और बागवानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। इसी को देखते हुए उद्यान विभाग ने बागवानों के लिए विस्तृत तकनीकी एडवाइजरी जारी की है। जिला उद्यान अधिकारी जितेंद्र कुमार ने किसानों से समय रहते एकीकृत कीट प्रबंधन अपनाने की अपील की है, ताकि फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सके।
उन्होंने बताया कि आम, अमरूद और कद्दूवर्गीय सब्जियों में फल मक्खी (वैक्ट्रोसेरा स्पीसीज) सबसे खतरनाक कीटों में शामिल है। यह कीट फल के विकसित और पकने की अवस्था में सबसे अधिक हमला करता है। कई बार इसका प्रकोप इतना बढ़ जाता है कि 30 से 60 प्रतिशत तक फसल खराब हो जाती है। बारिश के मौसम में बढ़ी आर्द्रता और तापमान इसके प्रसार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं।

फल के भीतर अंडे देकर फसल कर देती है बर्बाद
जितेंद्र कुमार ने बताया कि मादा फल मक्खी अपने नुकीले अंडजनक अंग से फल की त्वचा में छेद कर सीधे गूदे में अंडे देती है। अंडों से निकलने वाले कीड़े फल के अंदर ही गूदे को खाते रहते हैं। इससे फल के भीतर सुरंगें बन जाती हैं और चिपचिपा द्रव निकलने लगता है। बाद में जीवाणु और फफूंद का संक्रमण बढ़ जाता है। फल समय से पहले सड़कर गिर जाते हैं और उनकी बाहरी सतह पर भूरे-काले धंसे धब्बे दिखाई देने लगते हैं। ऐसे फल बाजार में बेचने योग्य नहीं रह जाते।

जिला उद्यान अधिकारी जितेंद्र कुमार

पहले सफाई और आईपीएम, बाद में रासायनिक नियंत्रण
उद्यान विभाग ने किसानों को सीधे रासायनिक दवाओं पर निर्भर न रहने की सलाह दी है। जिला उद्यान अधिकारी के अनुसार किसानों को पहले एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) तकनीक अपनानी चाहिए। बागों की नियमित साफ-सफाई, खरपतवार नियंत्रण, समय पर शाखा कटाई और तुड़ाई बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि गर्मी के मौसम में हल्की जुताई करने से जमीन में छिपे कीट ऊपर आ जाते हैं और तेज धूप में नष्ट हो जाते हैं। खेत या बाग में गिरे सड़े-गले फलों को तुरंत एकत्र कर गहरे गड्ढे में दबा देना चाहिए या नष्ट कर देना चाहिए, ताकि उनमें पल रहे लार्वा खत्म हो सकें।
बैगिंग तकनीक से बढ़ेगी फल की गुणवत्ता
फल मक्खी के यांत्रिक नियंत्रण के लिए विभाग ने बैगिंग तकनीक अपनाने की सलाह दी है। छोटे और अपरिपक्व फलों को पॉलीप्रोपाइलीन, नॉन-वोवन पेपर या फोम कंपोजिट कवर से ढकने पर मक्खी अंडे नहीं दे पाती। इससे फलों की चमक, वजन और गुणवत्ता में सुधार होता है। साथ ही तापमान और आर्द्रता भी नियंत्रित रहती है।

ट्रैप लगाकर करें कीटों पर नियंत्रण
आम और अमरूद के बागों में मिथाइल यूजीनॉल ट्रैप 20 से 25 प्रति हेक्टेयर की दर से लगाने की सलाह दी गई है। वहीं कद्दूवर्गीय सब्जियों के लिए क्यू ल्यूर ट्रैप लगाने को कहा गया है। इससे वयस्क कीट आकर्षित होकर नष्ट हो जाते हैं और उनका प्रजनन चक्र टूटता है।
गुड़ और दवा से तैयार करें वैट एप्लीकेशन घोल
तकनीकी जानकारी देते हुए जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि 100 ग्राम गुड़, 2 मिली डेल्टामिथ्रिन 2.8 प्रतिशत ईसी और 2 लीटर पानी मिलाकर घोल तैयार किया जा सकता है। इस घोल को पेड़ के तने पर लेप कर प्लास्टिक बोतल में लटकाया जाए। साथ ही आसपास की झाड़ियों पर सुबह के समय इसका छिड़काव किया जाए। ध्यान रहे कि दवा सीधे फलों पर न पड़े।
उन्होंने नीम तेल का 2 से 3 मिली प्रति लीटर गुनगुने पानी में घोल बनाकर 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने की सलाह दी। आवश्यकता पड़ने पर डेल्टामिथ्रिन 2.8 प्रतिशत ईसी का 0.3 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फल तुड़ाई से तीन से सात दिन पहले छिड़काव किया जा सकता है।

ब्लैक इंच वर्म भी बना बागवानों की चिंता
जिला उद्यान अधिकारी ने कैटरपिलर/कटर कीट यानी ब्लैक इंच वर्म को भी आम उत्पादकों के लिए गंभीर खतरा बताया। यह कीट नई पत्तियों, कलियों और फलों को खाकर नुकसान पहुंचाता है। कई बार यह छोटे फलों को डंठल सहित काटकर जमीन पर गिरा देता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
इसके नियंत्रण के लिए बागों में लाइट ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है। रासायनिक नियंत्रण हेतु क्लोरोसाइपर, इमामेक्टिन बेंजोएट और स्पिनेटोरम आधारित दवाओं का निर्धारित मात्रा में छिड़काव करने को कहा गया है। जरूरत पड़ने पर 8 से 10 दिन बाद दोबारा छिड़काव किया जा सकता है।
कीटनाशक प्रयोग में लापरवाही पड़ सकती है भारी
जितेंद्र कुमार ने किसानों को कीटनाशकों के प्रयोग में विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि दवाओं को बच्चों और पशुओं की पहुंच से दूर रखें। छिड़काव के दौरान दस्ताने, मास्क और चश्मे का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करें। तेज हवा के दौरान छिड़काव न करें और हमेशा हवा की विपरीत दिशा में खड़े होकर दवा का प्रयोग करें।
उन्होंने यह भी कहा कि खाली डिब्बों और पाउच को खुले में न फेंककर मिट्टी में दबा देना चाहिए, ताकि पर्यावरण और पशुओं को नुकसान न पहुंचे।















