ओशो तनाव मुक्ति शिविर का सफलतापूर्ण समापन

पवन सचदेवा

टेलीग्राम संवाद,सोनीपत। मुख्य कारण बाहर नहीं, वरन हमारे भीतर है। इसलिए बाहर से दुख मिटाने के कोई भी उपाय सफल नहीं हो सकते। स्वयं के भीतर से रोग का उपचार करना होगा।’ ओशो के छोटे भाई स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने ऐसा समझाते हुए कहा–‘बाहर केवल लक्षण हैं। याद रहे कि लक्षण बीमारी का कीटाणु नहीं है। हम अपने मन में प्रवेश कर गए कीटाणु को समाप्त कर दें, तो लक्षण खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगे। बुखार का इलाज नहीं करना है। बुखार की वजह को समाप्त करना होगा।

दीपालपुर गांव में स्थित श्री रजनीश ध्यान मंदिर में पिछले सप्ताह तनाव मुक्ति साधना शिविर सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, जिसमें पूरे देश के विभिन्न प्रांतों से करीब 70 मित्र इस शिविर में भाग लेने आए थे। इस कार्यक्रम का संचालन किया डॉ. स्वामी शैलेंद्र व गुरुमां अमृत प्रिया ने। सहयोगी आचार्य के रूप में स्वामी मस्तो बाबा, मां मोक्ष संगीता व मां आस्था जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आनंदमय जीवन शैली की साधना में मुख्य रूप से भगवान बुद्ध द्वारा बताए गए चार आर्य सत्य और दुख निरोध के अष्टांगिक मार्ग को समझकर उसे अपनी जिंदगी में कैसे प्रयोग करें, इस संबंध में विस्तृत चर्चा हुई। हमारे मन में टेंशन किस कारण हैं और इनका निवारण किस प्रकार हो सकता है, इस संबंध में केवल वैचारिक नहीं बल्कि व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया गया। सभी भागीदारों ने अपनी जिंदगी के तनावों, कठिनाइयों, एवं मानसिक दुखों की घटनाएं सुनाईं। स्वामी जी तथा गुरु मां उन घटनाओं का विश्लेषण करके दुख मुक्ति का उपाय बताया।

स्वामी मस्तो बाबा ने कहा कि ध्यान द्वारा आत्म-रूपांतरण से समाधि प्राप्त होती है, उसी में जिंदगी की समस्याओं का समाधान मिलता है। हमारे मन में विचारों और भावनाओं की अराजक भीड़ का शोरगुल है। जब ध्यान में परिपूर्ण मौन होकर ईश्वर का स्वर सुनते हैं, तो शांति की अनुभूति होती है। परमातमा की वह सूक्ष्म आवाज, अनाहत नाद है, ओंकार का संगीत है। उसमें तल्लीन होने से आंतरिक आनंद की प्रतीति होती है।

उल्लेखनीय है कि गुरुवार 26 सितंबर को नए संन्यास दिवस का उत्सव मनाया गया। 1970 में इसी दिन ओशो ने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और दर्शन की व्याख्या करते हुए संन्यास दीक्षा देना प्रारंभ किया था। स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने इस विषय पर बीएसआर (भगवान श्री रजनीश) चैनल हेतु दोपहर 12.15 से 2.00 बजे तक साक्षात्कार दिया, जिसमें नए संन्यास की आवश्यकता और पुरानी प्रणाली में सुधार के बारे में प्रकाश डाला गया। प्रश्नकर्ता थे बीएसआर मीडिया के स्वामी राघव सत्यार्थी।

समस्त शिविरार्थियों द्वारा फीडबैक सत्र में अपनी-अपनी आत्मिक प्रगति का वर्णन किया गया। ओशो के प्रवचनों को सुनकर जीवन के प्रति उनकी समझ में, प्रज्ञा और विवेक में विकास हुआ है। उन्होंने कहा कि घर जाकर हम ओशो फेगरेंस के ऑनलाइन कार्यक्रमों में नियमित रूप से शामिल होकर अपनी जिंदगी में निखार लाते रहेंगे। मां मोक्ष संगीता और मां आस्था जी ने लगनपूर्वक साधना करने हेतु सबको धन्यवाद दिया। मां अमृत प्रिया जी ने विदाई सत्र में सबको प्रसाद रूपी मिष्ठान्न वितरित किए।