कल से श्राद्ध पक्ष प्रारंभ, वंशजों पर बरसेगी पितरों की कृपा

बरेली, टेलीग्रामहिन्दी। पितरों के प्रति अपार श्रद्धा का पावन पर्व यानी श्राद्ध पक्ष इस बार 29 सितंबर से 14 अक्टूबर तब सोलह दिनों तक चलेगा। इसे महालय श्राद्ध भी कहते हैं। हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह पर्व भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर अश्विन मास की अमावस्या तक रहता है। इस समय भगवान सूर्य भी कन्या राशि में गतिशील होते हैं। इसलिए इसे कनागत भी कहा जाता है। इसमें गत पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है।

ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा

ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा ने बताया कि धर्म ग्रंथो के अनुसार इस अवधि में जो भी अपने पूर्वजों की सेवा कर उनके निमित्त तर्पण ,श्राद्ध दान करते हैं। तो उन्हें पूर्वजों का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस पक्ष में पितृ सूक्ष्म रूप में धरा पर ही रहते हैं। और पितृ विसर्जन के दिन अपने धाम वापस लौट जाते हैं। धर्म शास्त्रों में सबसे बड़ी पूजा पूर्वजों के निमित्त तर्पण और दान और उनके प्रति श्रद्धा की है। जो कनागत में श्रद्धा नहीं करते तो ऐसे लोगों कुछ पितरों का आशीर्वाद नहीं मिलता और जीवन में रुकावटें अनेकानेक बाधाएं लगी रहती हैं और जो अपने पूर्वजों के प्रति श्राद्ध तर्पण दान करते हैं तो उनके यहां पितरों के साथ-साथ भगवान नारायण की भी कृपा प्राप्त होती है और जीवन में किसी भी प्रकार की कोई बाधा नहीं आती। नित्य -निरंतर सुख समृद्धि की प्राप्ति होती रहती है।पितृ पक्ष में नियमित रूप से दान-पुण्य करने से कुंडली में पितृ दोष दूर हो जाता है। पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण का खास महत्व होता है।

इनका चतुर्दशी तिथि में होता श्राद्ध

चतुर्दशी तिथि को केवल शस्त्रत्त्, विष, दुर्घटनादि से मृतकों का श्राद्ध होता है। उनकी मृत्यु चाहे किसी अन्य तिथि में हुई हो। चतुर्दशी तिथि में सामान्य मृत्यु वालों का श्राद्ध अमावस्या तिथि में करने का विधान है।

नवमी तिथि में होता है माता का श्राद्ध

पितृ पक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से आरंभ हो रहा है। यह हर वर्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से प्रारम्भ होकर आश्विन मास की अमावस्या तिथि तक मनाया जाता है। माता का श्राद्ध मात्रनवमी में किया जाता है।

प्रतिदिन तर्पण की सरल विधि

पितृपक्ष में हम अपने पितरों को नियमित रूप से जल अर्पित करें। यह जल दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके दोपहर के समय सीधे हाथ के पितृ पर्वत अर्थात अंगूठा और तर्जनी अंगुली के बीच से जल दान दिया जाता है। जल में काला तिल मिलाया जाता है और हाथ में कुश रखा जाता है। जिस दिन पूर्वज की देहांत की तिथि होती है, उस दिन अन्न और वस्त्रत्त् का दान किया जाता है। उसी दिन किसी ब्राहमण को भोजन भी कराया जाता है। इसके बाद अमावस्या को पितृपक्ष के कार्य समाप्त हो जाते हैं।

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Author: Telegram Hindi