शुभ संयोगों में राधा अष्टमी, मिलेगा सौभाग्य

बरेली, टेलीग्रामहिन्दी। जन्माष्टमी की तरह राधा अष्टमी का विशेष महत्व माना जाता है। क्योंकि भगवान श्री कृष्ण का नाम हमेशा राधा जी के साथ लिया जाता है। यह पर्व कृष्ण जन्माष्टमी के 15 दिन बाद भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी में मनाया जाता है। इस बार राधा अष्टमी 23 सितंबर शनिवार को अत्यंत मंगलकारी संयोग में मनाई जा रही है। जिस कारण इस त्यौहार का महत्व कई गुना अधिक बढ़ गया है।ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा के अनुसार इस बार शनिवार में सौभाग्य योग व्याप्त रहेगा। इस योग में पूजा अर्चना करने से सौभाग्य, सुख- संपदा इत्यादि की वृद्धि होती है। इस दिन विवाहित महिलाएं संतान सुख और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार जो लोग राधा रानी जी को प्रसन्न कर लेते हैं। उनसे भगवान श्री कृष्णा अपने आप प्रसन्न हो जाते हैं। कहा जाता है कि व्रत करने से घर में मां लक्ष्मी आती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। राधा रानी के विना भगवान श्री कृष्ण की पूजा भी अधूरी मानी जाती है। इसलिए राधा अष्टमी का त्यौहार भी कृष्ण जन्माष्टमी की तरह बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा

अष्टमी का मान और पूजा मुहूर्त

गत दिवस 22 सितंबर शुक्रवार को मध्यान 1:34 से अष्टमी का मान लग गया है। जो 23 सितंबर शनिवार कों दोपहर 12:17 तक अष्टमी तिथि रहेगी और उदया तिथि की प्रधानता के अनुसार यह पर्व शनिवार में ही मनाया जाएगा। शुभ मुहूर्त सुबह 7:33 से 9:03 तक शुभ का चौघड़िया मुहूर्त रहेगा। उपरांत दोपहर 12:05 से शाम 4:36 तक चर, लाभ, अमृत का चौघड़िया व्याप्त रहेगा जो पूजा के लिए अत्यंत मंगलकारी मुहूर्त माने जाते हैं।इस दौरान आप पूजा कर सकते हैं। माना जाता है कि राधा अष्टमी पर 108 बार ‘ॐ ह्नीं श्री राधिकायै नमः’ मंत्र का जाप करने से सुख-समृद्धि आती हैं।

ऐसे करें पूजा और व्रत

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निर्वृत्त होकर राधा अष्टमी के व्रत का संकल्प  लें। फिर राधा रानी की पूजा विधि विधान शुरू करें। राधा को पीले या सफेद वस्त्र अर्पण कर दें। फिर सफेद बर्फी और फल का भोग लगादें। कन्हैया जी को भी माखन मिश्री का भोग लगाये।इसके बाद राधा रानी की आरती करें। राधा रानी मां लक्ष्मी का ही स्वरूप मानी जाती हैं, लिहाजा आप पर राधा रानी की कृपा से सौभाग्य वृद्धि होगी।  ध्यान रहे, राधा रानी के साथ भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति भी स्थापित करें, क्योंकि दोनों के बीच अटूट प्रेम था।

राधा अष्टमी की कथा

एक बार राधा जी गौलोक से कही बहार गयी थी, तब श्री कृष्ण अपनी नीरजा नामक सखी के साथ विहार कर रहे थे। संयोग वश राधा वहा आ गयी और नीरजा के साथ कृष्ण को देख कर राधा क्रोधित हो गयी। और दोनों को भला बुरा कहने लगी। लज्जा वश नीरजा नदी बनकर वहा से चली गयी। कृष्ण के प्रति कुशब्दो को सुनकर कृष्ण का मित्र सुदामा आवेश में आ गया।

सुदामा राधा जी से आवेश में आकर बात करने लगे और इसे राधा जी नाराज हो गयी और उन्होंने सुदामा को दानव रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया, तो सामने सुदामा ने भी क्रोध में आकर राधा जी को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। राधा के शाप से सुदामा शंकचूर नामक दानव बना जिसका वध भगवान शिव ने किया और सुदामा के शाप के कारन राधा जी को मनुष्य रूप में जन्म लेके धरती पर आना पड़ा।

राधा अष्टमी का महत्व

ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की पूजा राधा रानी के बिना अधूरी मानी गई है। जो लोग कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखते हैं। उन्हें राधा रानी के जन्मोत्सव पर भी व्रत अवश्य रखना चाहिए। कहा जाता है कि राधाष्टमी के व्रत के बिना कृष्ण जन्माष्टमी के व्रत का पूरा पुण्य प्राप्त नहीं होता है। राधाअष्टमी के दिन राधा और कृष्ण दोनों की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजन करने वालों को सभी सुखों की प्राप्ति होती है। राधा रानी को वल्लभा भी कहा जाता है। राधा अष्टमी का व्रत विशेष पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है. इस व्रत को सभी प्रकार के कष्टों को दूर करने वाला बताया गया है. इस दिन सुहागिन स्त्रियां व्रत रखकर राधा जी की विशेष पूजा करती हैं. पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है. राधा अष्टमी का पर्व जीवन में आने वाली धन की समस्या की भी दूर करता है. राधा जी की इस दिन पूजा करने भगवान श्रीकृष्ण का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है. इस व्रत को रखने से जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है.

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Author: Telegram Hindi