



आईवीआरआई शोध में बंदर हो गए मांसाहारी और आक्रमणकारी
आर के सिंह
बरेली , टेलीग्रामहिन्दी। सभी लोग जानते हैं कि बंदर शरारती और उत्पाती होते हैं लेकिन मांसाहारी नहीं। जबकि पिछले दिनों आईवीआरआई शोध में मांसाहारी और आक्रमणकारी हो गए हैं।
आईवीआरआई निदेशक डा. त्रिवेणी दत्त ने बताया कि आज पूरे विश्व में हम जिसे इंसान कहते है, उसका वैज्ञानिक नाम होमो सेपियंस है। हमें होमो सेपियंस के वजूद का अब से 2.5 लाख साल पुराना सबूत मिल चुका है। जरा कल्पना कीजिये ढाई लाख साल होते कितने होते हैं।

आईवीआरआई निदेशक डा. त्रिवेणी दत्त
आईवीआरआई निदेशक डा. त्रिवेणी दत्त उन्होंने बताया कि थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन में बताया है कि हम बंदर से इंसान कैसे बने उनका मानना था कि हम सभी के पूर्वज एक हैं। उनकी थ्योरी थी कि हमारे पूर्वज बंदर थे, लेकिन कुछ बंदर अलग जगह अलग तरह से रहने लगे, इस कारण धीरे-धीरे जरूरतों के अनुसार उनमें बदलाव आने शुरू हो गए। उनमें आए बदलाव उनके आगे की पीढ़ी में दिखने लगे। शहरों में भी उनका खानपान बदल गया।
उन्होंने बताया कि हमारे देश में बंदर भगवान हनुमन का अवतार माना जाता है। हनुमन भगवान श्रीराम के भक्त तो थे ही, साथ ही वे भोलेनाथ भगवान शिव के भी बड़े भक्त माने जाते हैं।

खान-पान बदला तो हो गए आक्रामक और हिंसक
पहले बंदर डंडा दिखाते ही भाग जाते थे,लेकिन अब डंडा दिखाने पर आक्रामक हो जाते है। हमलावर होने की वजह क्या है? बंदर प्रजाति में प्रजनन क्षमता बढ़ी है। भूखे होने पर सडे-गले फल खा रहे हैं। उनमें बीमारियाँ भी बढ़ीं हैं।
भारतीय पशु चिकित्सा व अनुसंधान संस्थान (वन्य जीव प्रभाग) वैज्ञानिकों ने पांच माह पहले दिल्ली, उत्तर प्रदेश में वृंदावन, बरेली आदि बंदरों पर अध्ययन किया तो कई निष्कर्ष सामने आए हैं। निदेशक डा. त्रिवेणी सिंह बताते हैं कि जंगल व बाग आदि कटने से बंदरों को पसंदीदा फल मिलने बंद हो गए. इसलिए बन्दर आबादी में आने लगे।

वन्य जंतु विभाग प्रभारी डा. अभिजीत पावडे
वन्य जंतु विभाग प्रभारी डा. अभिजीत पावडे बताते है कि दिल्ली में लगभग 100 जिंदा व मृत बंदरों के एक्स-रे किए गए, उनमें 70% जबकि वृंदावन और बरेली में 5% बंदरों के फेफड़े के संक्रमण से ग्रसित थे, इन सभी को टीवी हुई थी ऐसे में कहा जा सकता है कि शहरी बंदर बीमारी से ग्रसित होने कारण अधिक आक्रामक होते जा रहे हैं. डा पावड़े ने बताया कि दिल्ली और वृंदावन के बंदरों के हमलों के अधिक मामले सामने आने पर तीन टीमें अध्ययन के लिए भेजी गई थी, दिल्ली की टीमों ने को जिंदा बंदरों को पकड़कर उनके स्वभाव एवं खानपान पर अध्ययन किया।
बीमारी के सवाल पर वैज्ञानिक बताते हैं कि मजबूरी में आबादी क्षेत्र में आए भूखे बंदरों को मुख्य रूप से मानव भोजन शहरी बन्दर अंडा, और कुकर में रखा मीट भी खा लेते है। मौका मिलते ही किचन में रखी, पूड़ी-सब्जी आदि सब खा जाते है। फेंकी हुई खराब पूड़ी , खराब सब्जी, यह सड़े फल खाने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, रेस्टोरेंट बाहर बाहर डस्टविन में रखी जूठन भी खाते है। बल्कि ठेले पर खड़े होकर कबाब, मछली पकौड़ी आदि खाने वाले कुछ न कुछ प्लेट में छोड़ देते है। वह भी बन्दर खा लेते है। अब तो ये कच्चा पक्का मीट खा लेते हैं। इस कारण बंदरों को भी टीवी हो रही है

शहरों में बढ़ रहे हैं बंदर
शहरी क्षेत्र में अक्सर चर्चा होती है कि बंदरों की संख्या बढ़ गई है, इस पर डा. अभिजीत पावड़े का कहना कि शहरी बन्दर प्रतिदिन तामसी भोजन करने लगे हैं।
प्रजनन क्षमता पहले से कई गुना बढ़ गयी है। बंदरों का बसेरा आबादी क्षेत्र में भी हो गया है। उन्होंने बताया कि बंदरों की बीमारियां मनुष्यों में भी पहुंच सकती हैं। वे कहते हैं कि बंदरों को उनके मूल स्थान पर पहुंचाएं म तभी हमलावर बंदरों से निजात मिलेगी।
वृंदावन में ले जाते हैं चश्मा
वृंदावन में श्रद्धालुओं का चश्मा उतार ले जाने और शिकायतों पर भी अध्ययन हुआ इसमें पाया गया कि श्रद्धालुओं ने उन्हें शीतल पेय का आदि बना दिया है। जूस, फ्रूटी आदि पिलाना शुरू दिया है।
वृंदावन में श्रद्धालुओं का चश्मा खींच कर ले जाते हैं। फ्रूटी देकर चश्मा वापस लिया जा सकता है। बन्दर एडिक्ट (नशेड़ी) भी हो रहे हैं। मनुष्य के हाथ से भोजन थैली छीन लेना सामान्य बात है। उनके पीछे भागने और प्रतिक्रिया करने वाले को काट लेते है।

कुछ रोचक तथ्य
- बंदरों में लगभग 260 प्रजातियां होती है।
- ज्यादातर प्रजाति पेड़ों पर रहते है लेकिन कुछ जमीन, पहाड़ी इलाकों में भी रहते है।
- बंदर सर्वहारी जीव है जो पेड़ पौधों में लगे फल और मांस भी खाते हैं।
- बंदरों का जीवन काल लगभग 10 से लेकर 40 साल तक का होता है।
- बंदरों की एक ऐसी प्रजाति जिसे बबून कहते है वो लगभग 40साल तक जीवित रह सकतें है।
- चार्ल्स डार्विन के मानव विकास के सिद्धांत के अनुसार हमारे यानी इंसानों के पूर्वज बंदर थे।
- दुनियां का सबसे छोटा बंदर लगभग चूहे जितना होता है।
- ज्यादातर बंदर की प्रजातियों की पूंछ होती है।
- बंदरों में लगभग 32 से 36 दांत होते हैं ।
- बंदर दिवस 14 दिसंबर को मनाया जाता है।
- बंदरो की पूंछ बहुत ही ताकतवर होती है।
- ऑस्ट्रेलिया और अंटार्टिका में बंदर नही मिलते।
- कुछ बंदर इंसानों की तरह ही खाने को धोकर खाते हैं।
- बारिश के मौसम में कुछ बंदरों को बहुत छीक आती है।
- वर्तमान समय में कुछ बंदरों की प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर है।

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