



संजय सैनी
नैमिषारण्य, टेलीग्राम हिन्दी। आम जनमास में भगवान श्रीराम का नाम आते ही खुद ब खुद अयोध्या का नाम आ जाता है। स्मृति पटल पर उनका जन्मस्थल तैरने लगता है। मन आनन्द से भर जाता है। लेकिन यह बात बहुत ही कम लोगों को पता होगी कि स्वयं-भू मनु और महारानी सतरूपा ने नैमिषारण्य में तेईस हजार साल कठोर तपस्या की थी। इसके बाद ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को अयोध्या प्रगट होना पड़ा। इसलिए राष्टृ संत मोरारी बापू ने यहां रामकथा में कहा था कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की गंगोत्री है नैमिषारण्य तीर्थ। नैमिषारण्य सतयुग का तीर्थ है। यह हम नहीं कह रहे बल्कि हमारे वेद-पुराणों में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। यहां तक रामचरितमानस बालकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भगवान श्रीराम का विस्तार से उल्लेख करते हुए लिखा है कि तीर्थ वर नैमिष विख्यात,अति पुनीत साधक सिद्ध दाता।
गोस्वामीजी ने लिखा है कि भू-मंडल पर एकछत्र राज करने वाले महाराज स्वयं -भू मनु को अचानक आभास हुआ कि अब वो बावन हजार साल के है चुके हैं। आप लोग सोच रहे होंगे कि इतनी उम्र तो होती ही नहीं है,तो हम बता देते हैं कि सतयुग में एक लाख साल,त्रेतायुग में दस हजार साल, द्वापर युग में एक हजार साल साल और कलयुग में सौ साल की उम्र हमारे धर्मग्रंथों में वर्णित है। लिहाजा मनु महाराज विचार करने लगे कि समस्त पृथ्वी पर राज करते हुए हजारों साल बीत गए। और वह उसी ईश्वर को भूल बैठे जिसने उनको सुख और वैभव प्रदान किया है। ऐसा मन में विचार आते ही मनु महाराज ने अपने पुत्र उत्तानपाद को समस्त राजपाट सौंप दिया। मन में ईश्वर की आस्था लिए शेष जीवन तपस्या करने का संकल्प लेकर धर्मपत्नी महारानी सतरूपा के साथ वन की ओर चल दिए।
जब दंपति नैमिषारण्य तीर्थ पहुंचे
तो यह पहले से 88000 हजार ऋषि-मुनियों किये जा रहे ज्ञान यज्ञ की शब्दश्रुतियां उनके कानों में गूंजने लगी इससे दंपति आनंद विभोर हो गए और मन में ठान लिया कि तपस्या के लिए इससे पवित्र स्थान कोई और हो ही नहीं सकता। इसी दौरान कुछ ऋषि-मुनि मनु, सतरूपा के नजदीक पहुंचे और उनका स्वागत किया। दंपति ने गोमती नदी में स्नान कर ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए वल्कल वस्त्रों को धारण किया और एकांत में बैठकर तपस्या करने लगे। इस प्रकार तेईस हजार साल बीत गए। घनघोर तपस्या देखकर ब्रह्मा विष्णु महेश की बार दंपती के पास वरदान देने के लिए पहुंचे। फिर भी तपस्या में लीन दंपति ने आंखें नहीं खोली। अंत में भगवा बिस्वास भगवान ने उन्हें दर्शन देकर वर मांगने को कहा। इसपर मनु महाराज ने भगवान से त्रिवाचा संकल्प लेकर वरदान देने का अनुरोध किया। एवमस्तु कहकर भगवान ने कहा कि राजन तुम्हारा कठोर तप पूर्ण हुआ वरदान मांगों। स्वयंभू मनु महाराज ने भगवान से पुत्र रूप में उनके घर जन्म लेने की विनती की। भगवान विश्वास ने दंपति को अन्य वर मांगने को कहा। हजारों पुत्र देने को कहा लेकिन दंपति को टस से मस न होते हुए देख विश्वास भगवान ने कहा राजन हम प्रसन्न है। वरदान देते हैं। त्रेतायुग में मैं आपके घर जन्म लूंगा।
उस समय तुम अयोध्या के राजा दशरथ और महारानी सतरूपा कौशल्या होगी। साथ ही भगवान ने उन्हें एक युग तक प्रतीक्षा करने को कहा। इसके बाद भगवान अंतर्धान हो गए।


