विश्व पर्यावरण दिवस: हरीतिमा संवर्धन की अद्वितीय परंपरा की संवाहक है सनातन संस्कृति

सनातन संस्कृति विश्व की सबसे समृद्ध जीवनशैली है। इसमें प्रकृति के कई रहस्य छिपे हुए हैं। आज पर्यावरण संरक्षण को लेकर दुनिया में हायतौबा मची हुई है। ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण एवं जल संकट ने सबकी चिंता बढ़ा दी है। हमारे पूर्वजों को इस स्थिति का अनुमान हजारों वर्ष पूर्व से ही था। इसीलिए उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को हमारी जीवनशैली का अभिन्न अंग बना दिया। हमारी सनातन संस्कृति में आदिकाल से ही विभिन्न प्रकार के वृक्षों एवं जलस्रोतों को पूजा जाता है। इसके पीछे का वैज्ञानिक आशय यही है कि पर्यावरण और जल का संरक्षण हों, जिससे प्रकृति समृद्ध रहे और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहे।

हमारी सनातन संस्कृति में पीपल, बरगद, तुलसी, आंवला, समी, रुद्राक्ष आदि के पेड़ों के पूजन का विधान है। इसके अलावा विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में पलाश, गूलर, आक, गुड़हल, धूप सहित विभिन्न पौधों की पत्तियों व पुष्प आदि के प्रयोग का विधान है। 24 घंटे प्राणवायु देने वाले पीपल व वट वृक्षों के नीचे असंख्य मनीषियों ने अन्न-जल ग्रहण किए बिना ही घोर तप किया। सनातन परंपरा के अनुरूप फलदार पौधे लगाना अत्यंत श्रेयस्कर माना गया है। इससे अक्षय पुण्य मिलता है। साथ ही हमारी संस्कृति में तुलसी के साथ ही आम के पौधों का भी विवाह कराया जाता है। हमारे पूर्वजों ने यह सारी कवायद पर्यावरण संरक्षण के लिए ही की। आशय था कि धरती का श्रृंगार कायम रहे और हरीतिमा हमारी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित एवं समृद्ध बनाए रखे। अब जबकि हमारा पर्यावरण संकट में है तो हमारा दायित्व बनता है कि हम इसके संरक्षण के लिए सतत प्रयत्न करें। आज संकल्प लेने का दिवस है कि हम अपनी सनातन संस्कृति का अनुसरण करते हुए पर्यावरण को संरक्षित करने का अनवरत प्रयास जारी रखेंगे। अधिक से अधिक पौधे लगाकर वृक्ष बनने तक उनका संरक्षण करेंगे। भविष्य में यही पौधे वृक्ष का आकार लेंगे। हमारी आने वाली पीढ़ियों को सांसों का अमूल्य उपहार देंगे।

-ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा – बरेली

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