होली:यह पर्व हमें अहंकार और द्वेष छोड़कर प्रेम और उल्लास में डूब जाने का अवसर देता है:ओशो

पवन सचदेवा

टेलीग्राम संवाद,सोनीपत। होली महज रंगों और मस्ती का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति और आनंद का संदेश भी है। ओशो रजनीश का दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि यह पर्व जीवन को खुलकर जीने और उसके हर रंग को अपनाने की प्रेरणा देता है। इस अवसर पर ओशो अनुज स्वामी शैलेंद्र सरस्वती से हुई विशेष बातचीत में उन्होंने होली और ओशो के गहरे आध्यात्मिक दृष्टिकोण को साझा किया।

होली का आध्यात्मिक संदेश

ओशो के अनुसार, होली केवल सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आत्मिक उन्मुक्ति का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि जीवन के हर रंग को अपनाकर हम अपने भीतर छिपी बाधाओं से मुक्त हो सकते हैं। ओशो कहते हैं, “होली मनाने का अर्थ है भीतर की गंदगी को जला देना। जिस दिन तुम अपने भीतर के राग-द्वेष को राख कर देते हो, उसी दिन तुम होली के सच्चे अर्थ को समझ पाते हो।”

रंग और जीवन का उत्सव

होली का रंग केवल बाहरी नहीं होता, यह हमारे भीतर की भावनाओं को भी उजागर करता है। ओशो के अनुसार, यह पर्व हमें अहंकार और द्वेष छोड़कर प्रेम और उल्लास में डूब जाने का अवसर देता है। जब हम एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो वहाँ न कोई भेदभाव होता है, न कोई ऊँच-नीच। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन में असली आनंद सीमाओं को तोड़कर, मुक्त होकर जीने में है।

होलिका दहन: भीतर के अहंकार का अंत

ओशो बताते हैं कि होलिका दहन केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश है। यह हमें अपने भीतर की नकारात्मकता – जैसे ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार – को जलाने की प्रेरणा देता है। जब हम इन भावनाओं से मुक्त हो जाते हैं, तभी हम जीवन के असली रंगों का आनंद ले सकते हैं।

भोग से योग की ओर यात्रा

ओशो का मानना था कि होली जीवन के भोग से योग की ओर जाने का संकेत देती है। जब व्यक्ति पूरे उल्लास और मस्ती में रंग जाता है, तभी वह अपनी सीमाओं को पार करके एक नए आध्यात्मिक स्तर पर पहुँच सकता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि आनंद भी एक साधना हो सकता है, यदि हम उसे पूरी जागरूकता के साथ अनुभव करें।

ओशो का संदेश: जीवन को रंगों की तरह अपनाओ