दाऊजी का हुरंगा: प्रेम, भक्ति और रंगों की अलौकिक लीला

ब्रज की धरा पर भगवान बलराम के आशीर्वाद से सजी अनूठी होली

पवन सचदेवा

टेलीग्राम संवाद,मथुरा। होली का पर्व भले ही पूरे भारत में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता हो, लेकिन ब्रज क्षेत्र की होली का कोई सानी नहीं। खासतौर पर मथुरा जनपद के बलदेव नगर स्थित दाऊजी महाराज मंदिर में मनाया जाने वाला हुरंगा महोत्सव भक्ति, प्रेम और शक्ति का अनोखा संगम है।

यह उत्सव केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि भगवान बलराम की अनूठी लीलाओं का पुनरावर्तन है, जिसमें भक्ति और शक्ति का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है। इस विशेष आयोजन में पुरुष और महिलाएं परंपरागत रूप से उत्सव में भाग लेकर ब्रज की अलौकिक संस्कृति को जीवंत बनाते हैं।


भगवान बलराम: शक्ति और प्रेम के आराध्य

श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम जी ब्रज के एक महत्वपूर्ण आराध्य देव हैं। वे केवल बल (शक्ति) के प्रतीक ही नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और धर्म के रक्षक भी हैं। दाऊजी का हुरंगा उनकी शक्ति और भक्ति का अद्भुत समागम है, जिसमें भक्तगण प्रेम के रंग में रंगकर स्वयं को ब्रज की लीलाओं का भाग मानते हैं।

मंदिर के सेवायत गोस्वामी बैकुंठनाथ पांडेय जी बताते हैं कि—


हुरंगा: जब रंगों से सराबोर होती है भक्ति

दोपहर 12 बजे जैसे ही हुरंगा आरंभ होता है, मंदिर प्रांगण में हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है।

इस अद्भुत आयोजन की खासियत यह है कि—

पुरुषों (हुरियारों) का दल हुरियारिनों (महिलाओं) पर रंग उड़ेलता है।

हुरियारिनें हुरियारों के वस्त्रों को पकड़कर उन्हें खींच लेती हैं और उनसे कोड़े बनाकर प्रेमपूर्वक उन पर प्रहार करती हैं।

यह क्रम लगभग दो घंटे तक चलता है, जिसमें बलराम जी की लीला को जीवंत रूप दिया जाता है।

रंगों की शुद्धता और परंपरा

ब्रज क्षेत्र की होली अपने प्राकृतिक रंगों के लिए प्रसिद्ध है। इस उत्सव में—

टेसू के फूलों का रंग, गुलाबजल और केसर मिश्रित जल का प्रयोग किया जाता है।

मंदिर की छत पर गुलाल से भरी बोरियां रखी जाती हैं, जिन्हें जैसे ही फेंका जाता है, पूरा वातावरण गुलाल से रंगीन हो उठता है।


भक्ति संगीत और संकीर्तन का दिव्य वातावरण

हुरंगा महोत्सव के दौरान केवल रंग ही नहीं उड़ते, बल्कि भक्ति के रस में डूबी हुई आवाजें भी गूंज उठती हैं।

“नारायण! यह नैन सुख मुख सौं कह्यो न जाए!”

“अरे हारी री गोरी घर चाली, और जीत चले नंदलाल!”

ऐसे भजनों के साथ मंदिर परिसर अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है।

मंदिर सेवायतों द्वारा विशेष रूप से इस दिन बलराम जी के भजनों का संकीर्तन किया जाता है, जिसमें भाग लेने वाले भक्तजन भक्ति और आनंद के रंग में सराबोर हो जाते हैं।


परंपरा और विशेष आयोजन

यह हुरंगा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक धार्मिक परंपरा भी है, जिसमें सिर्फ मंदिर के सेवायत गोस्वामी परिवारों की महिलाएं एवं पुरुष ही भाग ले सकते हैं।

यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसका आधार भगवान बलराम की रासलीलाओं और ब्रज संस्कृति के प्रेममय स्वरूप में निहित है।

मान्यता है कि—
“जब तक हुरियारिनें हुरियारों को प्रेमपूर्वक पराजित नहीं कर देतीं, तब तक यह खेल चलता रहता है। और अंत में दोनों पक्ष प्रेमपूर्वक गले मिलकर इस भव्य उत्सव का समापन करते हैं।”


विश्वभर से उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़

बलदेव के इस मंदिर में आयोजित हुरंगा केवल मथुरा या भारत तक सीमित नहीं, बल्कि यह आयोजन वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है।

हर वर्ष देश-विदेश से हजारों पर्यटक और श्रद्धालु इस उत्सव का हिस्सा बनने के लिए आते हैं।

मंदिर की छतों से श्रद्धालु गुलाल उड़ाते हैं।

भक्तगण श्री बलराम जी की भक्ति में मग्न होकर जयकारे लगाते हैं।

पूरा नगर भक्ति और आनंद के रंग में रंग जाता है।


हुरंगा का समापन: जब प्रेम और भक्ति की जीत होती है

लगभग दो घंटे तक चलने वाले इस दिव्य आयोजन के उपरांत, भक्तगण नगर परिक्रमा करते हैं।

यह नगर परिक्रमा ब्रज की पवित्र भूमि पर भगवान बलराम की महिमा को पुनः रेखांकित करती है। भक्तजन इस दौरान—

“राधे-राधे!” और “बलराम जी की जय!” के उद्घोष करते हैं।

एक-दूसरे को गले लगाकर प्रेमपूर्वक गुलाल लगाते हैं।

अंततः यह उत्सव इस संदेश के साथ समाप्त होता है कि—
“भक्ति और प्रेम में सबसे बड़ी शक्ति निहित है, जो स्वयं ईश्वर को भी जीत सकती है!”