आत्मा कोई वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव है:स्वामी शैलेंद्र सरस्वती

पवन सचदेवा
टेलीग्राम संवाद, सोनीपत। विश्व मानव आत्मा दिवस पर ओशो अनुज स्वामी शैलेंद्र सरस्वती से हुई अंतरिम बातचीत के कुछ अंश, जिसमें स्वामी जी ने विश्व आत्मा के बारे मे बड़े ही सहज रूप से प्रकाश डाला

विश्व मानव आत्मा दिवस(World Human Spirit Day)

आत्मा, चेतना और मानवीय अस्तित्व की गहराई को समझने का एक अवसर है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मा हैं, जो अनंत और असीम संभावनाओं से भरी हुई है। ओशो, जो आधुनिक युग के प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु थे, उन्होंने आत्मा, ध्यान और जीवन के रहस्य को सरल शब्दों में समझाने का प्रयास किया। इस विशेष दिन पर, ओशो के विचारों को समझना और आत्मा की गहराइयों में उतरना हमारे लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है।

चैतन्य ही आत्मा है – ओशो

आत्मा: कोई वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव है
ओशो कहते हैं, “आत्मा कोई वस्तु नहीं है, जिसे पाया जा सकता है। यह एक अनुभव है, जो तब घटित होता है जब हम स्वयं से परे जाते हैं।” यह विचार हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि आत्मा कोई ठोस चीज नहीं, बल्कि अनुभूति है। यह तब महसूस होती है जब हम अपने अहंकार, शरीर और विचारों की सीमाओं से मुक्त हो जाते हैं। ध्यान के माध्यम से हम इस स्थिति तक पहुँच सकते हैं और अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान सकते हैं।

ध्यान: आत्मा से जुड़ने का एकमात्र माध्यम*
ओशो ध्यान को आत्मा से जुड़ने का सबसे प्रभावी साधन मानते थे। वे कहते हैं, “ध्यान का अर्थ है स्वयं के भीतर गहरे उतरना और उस मौन को खोजना, जहाँ विचार समाप्त हो जाते हैं और केवल अस्तित्व शेष रह जाता है।
विश्व मानव आत्मा दिवस हमें यह अवसर प्रदान करता है कि हम ध्यान करें, अपनी भीतरी शांति को महसूस करें और अपने भीतर के मौन को खोजें। जब हम ध्यान में गहराई से उतरते हैं, तो हमारा चैतन्य जागता है, और तब हमें आत्मा का बोध होता है।

अकेलापन और संन्यास

हमारा सबसे बड़ा भ्रम यह है कि कोई और हमारा है। लेकिन सत्य यह है कि आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी तुम्हारा नहीं है। जब यह अनुभूति भीतर गहरी हो जाती है, तब संन्यास जन्म लेता है। पर यह स्वीकार करना कठिन है, क्योंकि हम रिश्तों और अपेक्षाओं से बंधे रहते हैं।

भागने से कुछ हल नहीं होगा। कोई भी हिमालय जाकर सच को नहीं पा सकता। संन्यास का अर्थ है – जहां हो, वहीं रहकर, भीतर की चेतना को जगाना। जब हम जागरूक होकर जीना सीखते हैं, तभी सच्चा संन्यास जन्म लेता है।

प्रेम और स्वतंत्रता: आत्मा की अनिवार्य अवस्थाएँ*
ओशो ने प्रेम और स्वतंत्रता को आत्मा की दो आवश्यक अवस्थाएँ बताया है। वे कहते हैं, “प्रेम का अर्थ है, दूसरे को उसकी संपूर्ण स्वतंत्रता के साथ स्वीकार करना। यदि प्रेम में स्वतंत्रता नहीं है, तो वह प्रेम नहीं, बंधन है।”
आत्मा का वास्तविक अनुभव तब होता है जब हम प्रेम को बिना किसी स्वार्थ और शर्त के जीते हैं। प्रेम हमें बांधता नहीं, बल्कि हमें हमारी वास्तविकता से परिचित कराता है। जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो हमें उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। यही सच्चा प्रेम और आत्मा का वास्तविक रूप है।

स्वयं को जानो

आत्मा कोई सिद्धांत नहीं है, जिसे बस मान लिया जाए। आत्मा एक अनुभव है, जिसे चैतन्य के माध्यम से जाना जा सकता है। जितने अधिक जागरूक बनोगे, उतना ही आत्मा का बोध होगा। लेकिन अभी तुम लगभग बेहोश हो, जीवन को बिना होश में आए जी रहे हो।

ओशो कहते हैं कि सच्चा आनंद बेहोशी में नहीं, बल्कि होश में है। जब तुम पूरी तरह से सचेत हो जाते हो, तभी आत्मा और परमात्मा का अनुभव होता है। इसलिए चैतन्य को बढ़ाओ, क्योंकि “चैतन्य ही आत्मा है।”

विश्व मानव आत्मा दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि आत्म-अन्वेषण की एक यात्रा की शुरुआत है। ओशो के विचार हमें यह सिखाते हैं कि आत्मा को समझने के लिए हमें ध्यान, प्रेम और स्वतंत्रता को अपनाना होगा। जब हम स्वयं को पहचान लेते हैं, तो हम न केवल व्यक्तिगत रूप से, बल्कि संपूर्ण मानवता के स्तर पर एक नई ऊर्जा का संचार कर सकते हैं।

इस दिवस पर हम सभी को अपने भीतर झाँककर यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि हम कौन हैं, क्यों हैं और हमारी वास्तविक प्रकृति क्या है। ओशो की शिक्षाएँ हमें इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर देने में सहायक हो सकती हैं।