विश्व सम्मोहन दिवस पर विशेष

दिमाग को अपने हिसाब से कैसे चलाएं

पवन सचदेवा

टेलीग्राम संवाद, सोनीपत। 4 जनवरी में दुनिया भर में विश्व सम्मोहन दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर दीपालपुर गांव स्थित श्री रजनीश ज्ञान मंदिर में आत्म-सम्मोहन की कला पर तीन दिवसीय शिविर आयोजित किया गया है। शिविर 5 जनवरी तक चलेगा। जिसमें देश-विदेश से 60 से अधिक प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं।

ओशो अनुज, स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने बताया कि इस प्रकार के आत्म-सम्मोहन शिविर साल में दो बार आयोजित किए जाते हैं। यह प्रतिभागियों को उनके भीतर छुपी हुई क्षमताओं को विकसित करने, परीक्षा और इंटरव्यू में बेहतर परिणाम प्राप्त करने, तथा पुरानी बीमारियों से छुटकारा पाने में सहायता करता है। आत्मसम्मोहन केवल मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य सुधार के लिए ही नहीं, बल्कि मधुर संबंध बनाने, आर्थिक समृद्धि प्राप्त करने, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी प्रभावी माना गया है।

सम्मोहन के प्रति भ्रांतियों पर प्रकाश डालते हुए स्वामी जी ने कहा कि आमतौर पर सम्मोहन को वशीकरण समझा जाता है, जिसमें व्यक्ति अपना नियंत्रण खो देता है। जबकि सत्य यह है कि सम्मोहन एक वैज्ञानिक विधा है, जिसमें व्यक्ति अपने मन और शरीर पर गहन नियंत्रण प्राप्त करता है। सतगुरु ओशो ने इसे नई दिशा देते हुए आत्म-सम्मोहन की विधि विकसित की। इसमें व्यक्ति किसी अन्य के नियंत्रण में नहीं होता, बल्कि स्वयं को सकारात्मक सुझाव देकर जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।

स्वामी जी ने कहा कि कि सम्मोहन का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी समझने जैसा है। पौराणिक समय से ही भारत में साधु-संत इसे साधना और मोक्ष प्राप्ति का साधन मानते थे। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने सम्मोहन के द्वारा जाति स्मरण का विज्ञान खोजा था, जिसमें हमें अपने विगत जन्मों की यादें आ जाती हैं। 19वीं सदी में डॉ. जेम्स ब्रेड ने “हिप्नोटिज्म” शब्द को परिभाषित किया। चिकित्सा के क्षेत्र में सम्मोहन का उपयोग नींद संबंधी विकार, पुराने दर्द, और नशे की आदतों से छुटकारा पाने के लिए किया जा रहा है।

आज, सम्मोहन, साइकोथेरेपी, और ध्यान के संयोजन से जीवन को पूरी तरह रूपांतरित करने की संभावना है। आकर्षण के नियम के अनुसार, आत्म-सम्मोहन हमारे विचारों को वास्तविकता में बदलने में सहायक होता है। ओशो न कहा है कि मैं आपको नई त्रिमूर्ति दे रहा हूं- मनोचिकित्सा, आत्म-सम्मोहन और ध्यान का समन्वय। ये तीनों मिलकर मनुष्य जाति का कल्याण कर सकते हैं।
उन्होंने समझाया कि सांसारिक जीवन में ही नहीं, बल्कि वैचारिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक जीवन में भी सफलता पाने का सूत्र सम्मोहन ही है। ओशो ने इस संबंध मे अनेक प्रवचन दिए हैं जो की सम्मोहन और पुनर्जीवन विषयों पर है l