



पवन सचदेवा
टेलीग्राम संवाद,सोनीपत। कुमाशपुर, दीपलपुर रोड, सोनीपत स्थित ओशो फ्रेग्रेंस आश्रम में स्वामी शैलेंद्र सरस्वती जी से प्रथम अन्तरराष्ट्रीय ध्यान दिवस 21 दिसम्बर-2024 पर टेलीग्राम संवाद के विशेष प्रतिनिधि की हुई बातचीत के कुछ अंश…..
प्रश्न : स्वामी जी ओशो की दृष्टि में परिवार का पालन पोषण एवं जिम्मेदारी पहले महत्वपूर्ण है या ध्यान, अध्यात्म, भक्ति आदि ज्यादा महत्वपूर्ण है ?
स्वामी जी का उत्तर : ओशो के दृष्टिकोण से, जीवन में परिवार का पालन-पोषण, जिम्मेदारी, और ध्यान-अध्यात्म दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनमें संतुलन स्थापित करना सबसे आवश्यक है। उनका मानना था कि एक सच्चा और परिपक्व जीवन तब ही संभव है जब व्यक्ति दोनों क्षेत्रों में सामंजस्य और संतुलन बनाए रखे। ओशो के अनुसार:

जीवन के हर पहलू में संतुलन:
ओशो का कहना था कि जीवन का कोई एक पहलू दूसरे से कम या ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। चाहे वह परिवार की जिम्मेदारियाँ हों या ध्यान और अध्यात्म—दोनों ही व्यक्ति की पूर्णता के लिए आवश्यक हैं। परिवार के प्रति दायित्व और अध्यात्मिक जीवन के बीच कोई विरोधाभास नहीं होना चाहिए।
ध्यान और परिवार साथ-साथ:
ओशो के अनुसार, ध्यान और अध्यात्म का अर्थ यह नहीं है कि आप परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों से दूर भागें। बल्कि, ध्यान आपको अपने परिवार और जीवन के दायित्वों को बेहतर तरीके से निभाने की शक्ति और समझ देता है। ध्यान आपके मन को शांत और संतुलित करता है, जिससे आप अपने रिश्तों में अधिक प्रेम, करुणा, और समझदारी के साथ पेश आ सकते हैं।

जिम्मेदारी में ध्यान का महत्व:
ओशो मानते थे कि परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते समय भी व्यक्ति ध्यान और आत्मबोध में लीन रह सकता है। जब आप जागरूकता और ध्यान से अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं, तो यह एक साधना का रूप ले लेता है। परिवार की सेवा और उनकी देखभाल भी ध्यान और अध्यात्म का हिस्सा हो सकती है, यदि उसे पूर्ण जागरूकता और प्रेम से किया जाए।
परिवार और ध्यान के बीच संतुलन:
ओशो के अनुसार, संतुलन का अर्थ यह नहीं है कि आप एक समय पर सिर्फ ध्यान करेंगे और बाकी समय परिवार की जिम्मेदारियों को निभाएंगे। बल्कि, यह समझने की बात है कि आप दोनों के बीच तालमेल कैसे बिठा सकते हैं। अगर आप ध्यान की गहराई में उतरते हैं, तो यह आपके पारिवारिक जीवन को भी अधिक प्रेमपूर्ण, आनंदमय, और सशक्त बनाएगा। ध्यान आपकी आंतरिक ऊर्जा को निखारता है, जिससे आप अपनी बाहरी जिम्मेदारियों को भी बेहतर तरीके से निभा सकते हैं।

ध्यान में डूबे रहते हुए जिम्मेदारियों का निर्वाह:
ओशो इस बात पर जोर देते थे कि जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं को साथ लेकर चलना चाहिए। परिवार की जिम्मेदारियाँ और ध्यान दोनों को एक ही धारा में देखा जाना चाहिए। ध्यान केवल ध्यान केंद्र या ध्यानासन तक सीमित नहीं है; यह एक जीवन शैली हो सकती है। आप खाना बनाते समय, बच्चों के साथ समय बिताते समय, या नौकरी करते समय भी ध्यान में रह सकते हैं।

दोनों का मिलन: परिवार और अध्यात्म:
ओशो के अनुसार, परिवार और अध्यात्म को विरोधी ध्रुवों के रूप में देखने की बजाय, उन्हें एक-दूसरे का पूरक मानना चाहिए। अध्यात्म व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों को समझने और सही ढंग से निभाने में सक्षम बनाता है, जबकि परिवार का पालन-पोषण और जिम्मेदारियाँ आपके भीतर सहनशीलता, करुणा और प्रेम को बढ़ावा देती हैं, जो कि अध्यात्म के ही गुण हैं।

संतुलन साधने के सुझाव:
समय और स्थान का प्रबंधन: ध्यान और अध्यात्म के लिए प्रतिदिन कुछ समय निकालें, चाहे वह ध्यान हो, प्रार्थना हो, या आत्मचिंतन। इसके साथ ही, परिवार की जिम्मेदारियों को भी प्राथमिकता दें और उन्हें ध्यानपूर्वक निभाएं।

जागरूकता: ओशो के अनुसार, जो भी कार्य करें, उसे पूरी जागरूकता और सतर्कता के साथ करें। यह भी एक प्रकार का ध्यान है। अपने परिवार के साथ समय बिताते समय भी पूरी तरह से वहां मौजूद रहें, और ध्यान करते समय भी पूरी तरह से स्वयं में समाहित रहें।
निष्कर्ष:
ओशो का दृष्टिकोण यह था कि परिवार की जिम्मेदारियों और अध्यात्मिकता के बीच कोई द्वंद्व नहीं होना चाहिए। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, और व्यक्ति को संतुलित जीवन जीने के लिए इन दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए।


