



पवन सचदेवा
टेलीग्राम संवाद, सोनीपत।कुमाशपुर, दीपलपुर रोड स्थित ओशो फ्रेग्रेंस आश्रम मे स्वामी शैलेंद्र सरस्वती जी से हमारे विशेष प्रतिनिधि पवन सचदेवा से हुई खास बातचीत के कुछ अंश :
प्रश्न :
स्वामी जी ओशो की दृष्टि के अनुसार आज के युग में बुद्ध ज्यादा सार्थक हैं या कृष्ण ?
स्वामी जी का उत्तर :
पवन सचदेवा जी मै आपको इस पर ओशो के दृष्टिकोण के बारे मे कुछ बाते विस्तार से बताता हू :ओशो के अनुसार, बुद्ध और कृष्ण दोनों ही महत्वपूर्ण और अद्वितीय व्यक्तित्व हैं, और वे अलग-अलग जीवन दृष्टिकोण और साधना के मार्ग प्रस्तुत करते हैं। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि यह कहना कि बुद्ध अधिक सार्थक हैं या कृष्ण, इस पर निर्भर करता है कि व्यक्ति की आंतरिक आवश्यकता और प्रवृत्ति क्या है। दोनों का अपना विशिष्ट मार्ग है और दोनों ही आज के युग में प्रासंगिक हैं, लेकिन विभिन्न संदर्भों में..

बुद्ध की दृष्टि: शांति, ध्यान और निर्वाण
बुद्ध एक ऐसे मार्ग को प्रस्तुत करते हैं जो शांति, ध्यान, और आंतरिक मौन की ओर ले जाता है। उनका मार्ग अधिक शांत, संयमी और त्याग पर आधारित है। बुद्ध के मार्ग में वैराग्य, ध्यान (मेडिटेशन), और मौन पर अत्यधिक जोर है। वे संसार के दुख और भ्रम से मुक्ति पाने की बात करते हैं और इसे पाने के लिए व्यक्ति को भीतर की यात्रा करनी होगी।

आज के युग में बुद्ध का महत्व:
आंतरिक शांति और ध्यान: आज के युग में, जहाँ तनाव, भागदौड़, और मानसिक अशांति बहुत अधिक है, बुद्ध का मार्ग आंतरिक शांति और मानसिक संतुलन पाने में मददगार हो सकता है। ध्यान के माध्यम से लोग अपने भीतर की शांति को पा सकते हैं और तनावमुक्त जीवन जी सकते हैं।
वैराग्य और त्याग: उपभोक्तावाद और भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधाधुंध होड़ के इस युग में, बुद्ध का वैराग्य और त्याग का मार्ग हमें आंतरिक आनंद और स्थायित्व की ओर ले जा सकता है।

कृष्ण की दृष्टि: प्रेम, खेल और समर्पण
कृष्ण जीवन के प्रति अधिक समग्र और जीवंत दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं। वे जीवन को एक उत्सव, एक लीला (खेल) के रूप में देखते हैं। उनका मार्ग आनंद, प्रेम, संगीत, नृत्य, और समर्पण से भरा हुआ है। कृष्ण की गीता में जो संदेश है, वह कर्मयोग और भक्तियोग का संतुलन है—जीवन को पूर्णता के साथ जीने और संसार में रहते हुए भी आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँचने का रास्ता दिखाता है।

आज के युग में कृष्ण का महत्व:
समग्रता और जीवन का उत्सव: वर्तमान युग में, जहाँ लोग जीवन के सुखों और संबंधों का अनुभव करना चाहते हैं, कृष्ण का संदेश अधिक समग्र है। वे जीवन को एक उत्सव के रूप में जीने की प्रेरणा देते हैं और यह सिखाते हैं कि संसार में रहकर भी आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
कर्म और समर्पण: कृष्ण के कर्मयोग का सिद्धांत आज के युग में बेहद प्रासंगिक है। उनके अनुसार, कर्म करो लेकिन फल की चिंता मत करो। यह संदेश कार्यस्थल की समस्याओं, जीवन की चुनौतियों, और अस्थिरता में संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद उपयुक्त है।
ओशो की दृष्टि में दोनों का महत्व:
ओशो के अनुसार, बुद्ध और कृष्ण दोनों ही अद्वितीय हैं और जीवन के दो अलग-अलग पहलुओं को संबोधित करते हैं। ओशो ने यह कहा है कि बुद्ध एक निष्क्रिय, शांत और वैराग्यपूर्ण मार्ग दिखाते हैं, जबकि कृष्ण जीवन की लीला और प्रेम में डूबे हुए हैं।बुद्ध के मार्ग में शांति और मौन है, जो उन्हें आकर्षित करता है जो आंतरिक शांति और ध्यान की खोज में हैं।

कृष्ण का मार्ग प्रेम, भक्ति और कर्मयोग का है, जो उन लोगों को प्रेरित करता है जो जीवन के हर रंग में आनंद खोजते हैं और इसे एक खेल की तरह जीते हैं।

क्या दोनों का संतुलन संभव है ?
ओशो का मानना है कि बुद्ध और कृष्ण के दृष्टिकोणों में कोई विरोधाभास नहीं है। वे दो ध्रुवों की तरह हैं, और व्यक्ति को इन दोनों ध्रुवों के बीच संतुलन बनाना चाहिए। जीवन में कभी-कभी हमें बुद्ध की शांति और वैराग्य की आवश्यकता होती है, तो कभी कृष्ण के प्रेम और समर्पण की।बुद्ध का मार्ग आपको आंतरिक गहराई में ले जाता है और आपको स्वयं की खोज करने में मदद करता है। कृष्ण का मार्ग आपको संसार में रहते हुए भी आध्यात्मिकता को जीने का तरीका सिखाता है, प्रेम और आनंद के साथ।
ओशो के दृष्टिकोण से आज के युग में न तो केवल बुद्ध सार्थक हैं और न ही केवल कृष्ण। दोनों का अपना स्थान है और व्यक्ति की आंतरिक प्रवृत्ति और आवश्यकताओं के आधार पर, कोई भी मार्ग अपनाया जा सकता है। जो व्यक्ति ध्यान और शांति चाहता है, उसके लिए बुद्ध का मार्ग सही हो सकता है। और जो जीवन को एक उत्सव के रूप में जीना चाहता है, उसके लिए कृष्ण का मार्ग अधिक उपयुक्त हो सकता है।ओशो के अनुसार, दोनों में संतुलन साधना भी संभव है और आदर्श भी। जब व्यक्ति बुद्ध की मौनता और कृष्ण की समग्रता को एक साथ आत्मसात कर लेता है, तब वह जीवन में पूर्णता प्राप्त करता है।


