ओशो की पुण्यतिथि पर विशेष- कुंभ सामूहिक चेतना का महापर्व: ओशो

पवन सचदेवा

टेलीग्राम संवाद,सोनीपत। कुंभ मेला एक ऐसा अनूठा आयोजन है, जहां करोड़ों लोग धर्म, आस्था और अध्यात्म के धागे से जुड़े एक सामूहिक चेतना का निर्माण करते हैं। यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अध्यात्म और जीवन की गहरी समझ का प्रतीक है। यहां व्यक्ति के रूप में कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। भीड़ में हर चेहरा एक दूसरे में विलीन होकर सामूहिकता का भाग बन जाता है।

भीड़ से परे सामूहिक चेतना का निर्माण

कुंभ के आयोजन में लाखों-करोड़ों लोग एक साथ एकत्र होते हैं। ओशो इसे “सामूहिक चेतना का महासंगम” कहते हैं। उनका मानना है कि जब इतनी बड़ी संख्या में लोग एक ही अभीप्सा, एक ही प्रार्थना और एक ही उद्देश्य के लिए इकट्ठा होते हैं, तो यह सामूहिक चेतना का निर्माण करता है।

ओशो कहते हैं, “यहां व्यक्ति गायब हो जाता है, और एक ऐसी सामूहिक ऊर्जा का निर्माण होता है, जिसमें परमात्मा का अवतरण सरल हो जाता है। जब एक करोड़ लोग एक ही समय, एक ही ध्येय से प्रार्थना करते हैं, तो उनकी चेतनाएं एक-दूसरे के भीतर प्रवाहित होने लगती हैं। यह ऊर्जा का वह क्षेत्र बनाती हैं, जहां परमात्मा का अनुभव करना सरल हो जाता है।”

प्रार्थना का मूल स्वरूप: सामूहिकता में शक्ति

वैयक्तिक प्रार्थना, जो आधुनिक समय में अधिक प्रचलित हो गई है, ओशो के अनुसार, प्रार्थना का मूल स्वरूप नहीं है। सामूहिक प्रार्थना का महत्व इसलिए अधिक है, क्योंकि यह अहंकार से मुक्त करती है। व्यक्ति जब अपने व्यक्तिगत अस्तित्व से बाहर निकलकर सामूहिक चेतना का हिस्सा बनता है, तभी वह सच्ची प्रार्थना का अनुभव कर सकता है।

ओशो के अनुसार, “जब से व्यक्ति ने व्यक्तिगत प्रार्थना को अपनाया, तभी से प्रार्थना अपनी वास्तविक शक्ति खोने लगी। सामूहिक प्रार्थना में इतनी बड़ी ऊर्जा होती है कि वह पूरे ब्रह्मांड में गूंज सकती है।”

खगोलीय संयोग और कुंभ का महत्व

कुंभ मेला केवल लोगों के जुटने का उत्सव नहीं है, बल्कि इसका आयोजन खगोलीय घटनाओं और विशेष समय पर आधारित होता है। हर बार यह मेला ऐसे खगोलीय संयोग पर आयोजित किया जाता है, जब ऊर्जा का प्रवाह सबसे अधिक प्रभावशाली होता है।

ओशो कहते हैं, “प्रकृति का हर नियम एक क्रम में बंधा हुआ है। ऋतुएं एक समय पर आती हैं। शरीर की प्रक्रियाएं भी इसी क्रम का पालन करती हैं। जब एक बार किसी विशेष समय पर परमात्मा का अनुभव होता है, तो वह समय ऊर्जा से भर जाता है। यही कारण है कि हर कुंभ मेला विशेष तिथियों और स्थानों पर आयोजित किया जाता है, ताकि उस ऊर्जा को दोबारा महसूस किया जा सके।”

आध्यात्मिक ऊर्जा का महासंगम

कुंभ मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि अध्यात्म की उस धारा का स्मरण है, जहां व्यक्ति अपने व्यक्तिगत अस्तित्व से ऊपर उठकर सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाता है। यह केवल प्राचीन परंपरा नहीं, बल्कि आज भी हमें यह सिखाता है कि सामूहिकता के बिना परमात्मा के अनुभव का मार्ग कठिन है।

इस प्रकार, कुंभ मेला हमें सामूहिक चेतना की शक्ति और प्रार्थना के मूल स्वरूप को समझने का अवसर देता है। यही इसकी आध्यात्मिकता है, यही इसकी अद्वितीयता।