



ब्रह्मांड के चक्र, वैदिक खगोलशास्त्र, योग, पृथ्वी का घूर्णन और इसका मानव जीवन पर प्रभाव एक रहस्य है ।
पवन सचदेवा
टेलीग्राम संवाद, सोनीपत। 8 जनवरी में दुनिया भर में पृथ्वी घूर्णन दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर दीपालपुर गांव स्थित श्री रजनीश ध्यान मंदिर में हमारे विशेष प्रतिनिधि की ओशो अनुज, स्वामी शैलेंद्र सरस्वती से हुई विशेष बातचीत के कुछ अंश :-

प्रश्न :- स्वामी जी पृथ्वी का घूर्णन क्या है ?
कृपया इसका ब्रह्मांड, अध्यात्मिकता व ओशो के नज़रिए से महत्व बताये ।
स्वामी जी का उत्तर :-
पृथ्वी घूर्णन दिवस (Earth Rotation Day) हर साल 8 जनवरी को मनाया जाता है। यह दिन पृथ्वी की घूर्णन गति (Rotation) और इसके महत्व को समझने और सम्मान देने के लिए समर्पित है। साथ ही, इसका भारतीय संतों और आध्यात्मिकता से भी गहरा संबंध है।

पृथ्वी का घूर्णन और इसका वैज्ञानिक महत्व
पृथ्वी अपनी धुरी (Axis) पर पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है। एक घूर्णन में पृथ्वी को लगभग 24 घंटे लगते हैं, जिससे दिन और रात का चक्र बनता है।
8 जनवरी, 1851 को लियोन फौकॉल्ट (Léon Foucault) ने पहली बार पृथ्वी के घूर्णन को प्रयोगात्मक रूप से सिद्ध किया। उन्होंने फौकॉल्ट पेंडुलम का प्रयोग किया, जो यह दर्शाता है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। पृथ्वी के घूर्णन से कोरिओलिस प्रभाव, मौसम, समय क्षेत्र (Time Zones), और समुद्री धाराओं पर प्रभाव पड़ता है।

भारतीय संतों और आध्यात्मिकता से संबंध
भारत के ऋषि-मुनियों और संतों ने हजारों साल पहले ही प्रकृति और ब्रह्मांड के चक्रों को समझ लिया था। वैदिक खगोलशास्त्र और योग के माध्यम से उन्होंने पृथ्वी के घूर्णन और इसके जीवन पर प्रभाव का ज्ञान दिया।*
1.वैदिक ज्ञान
भारतीय ऋषियों ने सूर्य सिद्धांत के माध्यम से पृथ्वी की गति और घूर्णन को समझा ।
उन्होंने बताया कि दिन और रात का चक्र पृथ्वी के घूर्णन का परिणाम है।
2.योग और संतुलन
संतों ने सिखाया कि जैसे पृथ्वी संतुलित रूप से घूमती है, वैसे ही मनुष्य को अपने जीवन और मन को संतुलित रखना चाहिए। योग और ध्यान के माध्यम से आंतरिक शांति और स्थिरता को महत्व दिया गया।
3.पंचतत्व और पृथ्वी
सनातन धर्म में पृथ्वी को पंचतत्वों में से एक माना गया है। इसे “माता” का दर्जा दिया गया है। संतों ने पृथ्वी को एक जीवित इकाई के रूप में देखा और इसके चक्रों को जीवन का आधार बताया।
4.ज्योतिष और समय गणना
भारतीय ज्योतिष में पृथ्वी की गति और घूर्णन के आधार पर पंचांग और समय का निर्धारण किया जाता है।
आध्यात्मिकता से जुड़ा है जीवन जीने की कला का संदेश
चक्र का महत्व
पृथ्वी का घूर्णन यह सिखाता है कि जीवन में सब कुछ चक्र के रूप में चलता है—दिन-रात, सुख-दुख, और जन्म-मृत्यु। यह संतुलन और धैर्य का प्रतीक है।

ध्यान और आत्मचिंतन
जैसे पृथ्वी स्थिर रहते हुए भी घूमती है, वैसे ही संतों ने सिखाया कि बाहरी हलचल के बावजूद आंतरिक शांति बनाए रखना चाहिए।
प्रकृति का सम्मान
भारतीय संतों ने बताया है कि पृथ्वी और प्रकृति का सम्मान करना हमारा धर्म है। इसके चक्रों के साथ सामंजस्य बनाना ही सही जीवन जीने का मार्ग है।
पृथ्वी घूर्ण दिवस न केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों को याद करने का दिन है, बल्कि भारतीय संतों की शिक्षाओं को सम्मान देने का भी अवसर है। यह हमें बताता है कि जीवन और प्रकृति के चक्रों को समझना और उनके साथ संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।

ओशो के दृष्टिकोण से :पृथ्वी का घूर्णन केवल एक वैज्ञानिक घटना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय लय और अस्तित्व की गहरी समझ का प्रतीक है। उनका मानना था कि ब्रह्मांड में सब कुछ एक अद्भुत तालमेल और लय के साथ चल रहा है, और पृथ्वी का घूमना उसी का हिस्सा है। यह घूर्णन दिन-रात के चक्र और परिवर्तन की अनिवार्यता को दर्शाता है, जो हमें यह सिखाता है कि जीवन स्थिर नहीं है; इसे लय और परिवर्तन को अपनाकर ही समझा जा सकता है।

ओशो ने अक्सर इस बात पर जोर दिया : कि प्रकृति और ब्रह्मांड की सभी गतिविधियाँ एक अद्वितीय एकता का हिस्सा हैं। पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रह एक सामूहिक व्यवस्था में बंधे हुए हैं, जो हमें प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ सामंजस्य स्थापित करने का संदेश देता है। उनका कहना था कि ध्यान के माध्यम से हम इस ब्रह्मांडीय नृत्य को अनुभव कर सकते हैं और इसके साथ जुड़कर जीवन की गहरी सच्चाइयों को समझ सकते हैं।इस प्रकार, ओशो के विचारों में पृथ्वी का घूर्णन न केवल वैज्ञानिक तथ्य है, बल्कि यह हमें अस्तित्व की गहराइयों में झांकने और जीवन के साथ एक लयबद्धता स्थापित करने का आह्वान करता है। यह घटना हमें अपने भीतर और बाहर की लय को पहचानने और जीवन के हर पल के साथ जुड़ने का संदेश देती है।

