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भारतेंदु हरिश्चंद्र के कालजयी नाटक अंधेर नगरी चौपट राजा मंचन

टेलीग्राम संवाद,बरेली। एसआरएमएस रिद्धिमा प्रेक्षागृह में रविवार शाम भारतेंदु हरिश्चंद्र लिखित प्रसिद्ध नाटक अंधेर नगरी चौपट राजा मंचन हुआ। एसआरएमएस रिद्धिमा प्रस्तुत इस नाटक का निर्देशन विनायक कुमार श्रीवास्तव ने किया।

नाटक में अंधेर नगरी का वर्णन किया था। जहां एक महंत अपने दो शिष्यों नारायण दास और गोवर्धन दास के साथ पहुंचता है। महंत को नगर देखने में अच्छा लगता है और वह इसीलिए अपने शिष्यों को भिक्षा के लिए भेजता है। एक शिष्य पूरब और दूसरा पश्चिम दिशा में भिक्षा के लिए जाता है। शिष्य गोवेर्धन दास भिक्षा लेने नगर बाजार में जाता है तो बाजार में सारा सामान टका सेर में मिल जाता है। वह दुकानदार से नगर और यहां के राजा का नाम पूछता है। दुकानदार उसे नगर का नाम अंधेर नगरी और राजा का नाम चौपट बताता है। वह बताता है कि यहां पर सब सामान टका सेर में मिलता है। जैसे टका सेर में भाजी और टका सेर में खाजा। शिष्य गोवर्धन दास को लालच आ जाता है। नगर में रहने का निश्चय कर लेता है। उसका गुरु उसे नसीहत देता है, ऐसे नगर में ना रुके और यहां से चले। लेकिन गोवर्धन नहीं मानता है।

गुरु जी अपने एक शिष्य साथ दूसरे शहर चले जाते हैं। अगले दृश्य में राज दरबार दिखाया जाता है। जहां एक औरत फरियाद लेके आती है। कल्लू बनिया की दीवार गिर गयी और उसकी बकरी दीवार में दब कर मर गयी। राजा सिपाही भेज कर कल्लू बनिया को बुलाता है। कल्लू कहता है उसकी कोई गलती नहीं है मिस्त्री ने दीवार ठीक नहीं बनाई, इसलिए दीवार गिर गयी। राजा मिस्त्री को बुलवाता है। मिस्त्री दीवार गिरने की गलती के लिए मसाला और चूने वाले को दोषी बताता है। अब चूने वाले को बुलाया जाता है। चूने वाला भी भिश्ती को, भिश्ती कसाई को, कसाई गड़ेरिये को और गड़ेरिया कोतवाल को दोषी ठहरता है। राजा कोतवाल को फांसी की सजा सुना देता है। कोतवाल को फांसी पर लटका दिया जाता है, लेकिन उसकी गर्दन पतली होने की वजह से फांसी नहीं लग पाती। ऐसे में राजा उसकी सजा माफ कर देता है। उसकी जगह किसी दूसरे को फांसी लगाने का फरमान जारी करता है। ऐसा व्यक्ति जो मोटा, तंदरुस्त हो और उसकी गर्दन फांसी के फंदे के नाप की हो और फंदे में ठीक से आ जाए। सिपाही फंदा लेकर नगर में जाते हैं और शिष्य गोवर्धन दास को पकड़ कर दरबार में लाते हैं। जहां उससे अंतिम इच्छा पूछी जाती है। गोवर्धन अपने गुरु को याद कर उनसे मिलने की इच्छा बताता है। गुरु जी को लाया जाता है। वह गोवर्धन दास के कान में कुछ कहते हैं। इससे गोवर्धन खुश होने का नाटक करता है और जल्दी से फांसी का फंदा लगाने को कहता है। इस बात से राजा हैरत में पड़ जाता है और मौत के डर के बजाय उससे खुश होने की वजह पूछता है। गोवर्धन बताता है कि गुरू जी ने बताया है कि यह शुभ मुहूर्त है और इसमे जो भी फांसी पर चढ़ेगा वह सीधे स्वर्ग जाएगा। यह सुनकर दरबार में सभी लोग फांसी पर चढ़ने के लिए व्याकुल हो जाते है। लेकिन राजा सबको मना कर खुद स्वर्ग जाने के लालच में खुद फांसी पर चढ़ जाता है।

नाटक में राजा की भूमिका सूर्यप्रकाश ने निभाई। जबकि महंत मनोज शर्मा बने। शिष्य गोवर्धन दास के रूप में गौरव कार्की और नारायण दास के रूप में मानेश यादव मंच पर आए। शिवम यादव और सौम्य कश्यप ने सिपाहियों का किरदार निभाया। सब्जी वाली और फरियादी महिला की भूमिका विषा ने, हलवाई की शाहजीन खान, चूने वाले की आरके पाठक ने मंजन वाले की अभिनव शर्मा और कल्लू बनिया की जयदेव पटेल ने निभाई। नाटक में अमरनाथ और अनुग्रह ने संगीत दिया और साउंड व लाइट्स की जिम्मेदारी क्रमशः हर्ष और जसवंत ने निभाई।
इस मौके पर एसआरएमएस ट्रस्ट संस्थापक व चेयरमैन देव मूर्ति, आदित्य मूर्ति, सुभाष मेहरा, डा. प्रभाकर गुप्ता और तमाम दर्शक मौजूद रहे।