



पवन सचदेवा
टेलीग्राम संवाद, सोनीपत।सोनीपत के कुमाशपुर, दीपलपुर रोड पर स्थित श्री रजनीश ध्यान मंदिर, आध्यात्मिकता के प्रति जागरूकता और ध्यान के अभ्यास का प्रमुख केंद्र है। हाल ही में, मंदिर में स्वामी शैलेंद्र सरस्वती जी से टेलीग्राम संवाद के विशेष प्रतिनिधि ने गहन चर्चा की। इस बातचीत में उन्होंने कर्म, ध्यान और जागरूकता के महत्व पर प्रकाश डाला। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश, जो न केवल दर्शनशास्त्र की जटिलताओं को सरल बनाते हैं, बल्कि आध्यात्मिकता के वास्तविक अर्थ को भी स्पष्ट करते हैं।

कर्म-जाल से मुक्ति: दर्शन का एक नया दृष्टिकोण
प्रश्न: स्वामी जी, कृपया बताएं कि कर्म-जाल से मुक्ति कैसे संभव है?
उत्तर: स्वामी शैलेंद्र सरस्वती जी ने कहा, “इस प्रश्न को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ‘कर्म’ वास्तव में है क्या। प्राचीन वेदों में कर्म का उल्लेख उस कार्य के रूप में किया गया है, जो वर्तमान में किया जाता है। इसमें अतीत या भविष्य की योजनाओं का कोई स्थान नहीं है। लेकिन समय के साथ, जैन और बौद्ध धर्म में कर्म की अवधारणा ने जटिल रूप धारण कर लिया। यह धीरे-धीरे हिंदू धर्म में भी समाहित हो गई और इसे समझना कठिन होता गया।”
स्वामी जी ने बताया कि आधुनिक समय में लोग कर्म के प्रकार, उनके बंधनों, और उनसे छुटकारा पाने की विधियों पर अधिक चर्चा करते हैं, लेकिन वास्तविकता से दूर हो जाते हैं। “यह आवश्यक नहीं है कि आप अतीत के कर्मों को जलाने में अपना समय बर्बाद करें। इसके बजाय, आपको अपने वर्तमान को पूरी जागरूकता और प्रेम से जीने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।”

महावीर और कर्म की अवधारणा
स्वामी जी ने महावीर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि महावीर के अनुसार, “प्रमाद को कर्म कहा गया है, अप्रमाद को अकर्म।”
महावीर ने कर्म को एक गहन दृष्टिकोण से देखा। उनके अनुसार:
प्रमाद क्या है?
प्रमाद का अर्थ है मूर्छा, यानी किसी कार्य को अचेतन अवस्था में करना।
अप्रमाद क्या है?
अप्रमाद का अर्थ है जागरूकता, यानी किसी भी कार्य को पूरी सचेतनता और होशपूर्वक करना।
महावीर का दृष्टिकोण इस मामले में स्पष्ट है:
अगर कोई कार्य प्रमाद (मूर्छा) में किया गया है, तो वह कर्म है और वह बंधन उत्पन्न करता है।
लेकिन यदि वही कार्य अप्रमाद (जागरूकता) के साथ किया गया है, तो वह अकर्म है, यानी ऐसा कार्य बंधन उत्पन्न नहीं करता।
स्वामी जी ने इस बात पर जोर दिया कि महावीर के अनुसार, “कर्म” का अर्थ केवल कार्य करना नहीं है, बल्कि उस कार्य को करने की अवस्था मायने रखती है।

ओशो का दृष्टिकोण से
वर्तमान में जीने की कला
स्वामी शैलेंद्र सरस्वती जी ने ओशो के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि ओशो हमेशा वर्तमान में जीने पर जोर देते थे। उनका मानना था कि अतीत के कर्मों की चिंता करना या भविष्य की योजनाओं में उलझना मानव के लिए सबसे बड़ा भ्रम है।
ओशो के अनुसार:
“ध्यान का अर्थ है पूरी तरह होशपूर्वक वर्तमान में रहना। ध्यान कोई चमत्कारी उपाय नहीं है, जो अतीत को बदल सके या भविष्य को नियंत्रित कर सके। लेकिन यह वर्तमान को गहराई से जीने का साधन है।”
“अतीत के कर्मों को जलाने की प्रक्रिया में लोग अपने वर्तमान को नष्ट कर देते हैं। यह अनावश्यक है। वर्तमान ही वह समय है, जो आपके जीवन को रूपांतरित कर सकता है।”कर्म का सही और गलत: गहराई से विश्लेषण
महावीर और ओशो दोनों ही इस बात पर सहमत थे कि कर्म को सही या गलत की श्रेणियों में बांटना एक सतही दृष्टिकोण है। स्वामी जी ने इसे विस्तार से समझाते हुए कहा:यदि कोई व्यक्ति क्रोध करता है और उसे अपने क्रोध के प्रति होश नहीं है, तो वह बंधन में पड़ जाता है।
लेकिन अगर वही व्यक्ति क्रोध को पूरी जागरूकता के साथ अनुभव करता है, तो वह उस क्रोध के बंधन से मुक्त हो सकता है।
महावीर के शब्दों में:
“होशपूर्वक किया गया हर कार्य अकर्म है।”
“बेहोशी में किया गया हर कार्य बंधन है।”
ओशो ने इसे सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि जागरूकता ही धर्म है। जागरूकता के साथ किया गया हर कार्य पवित्र है, चाहे वह कार्य कितना भी साधारण क्यों न हो।
ध्यान: आध्यात्मिकता की कुंजी
स्वामी शैलेंद्र सरस्वती जी ने ध्यान को जीवन का महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा, “ध्यान का उद्देश्य केवल मानसिक शांति पाना नहीं है। यह आत्मा की गहराई तक जाने और अपनी असली पहचान को समझने का साधन है।”
उन्होंने ओशो के विचारों का हवाला देते हुए कहा:
“ध्यान वह उपकरण है, जो अतीत के कर्मों के बंधन को काटने में मदद करता है। यह आपको इस क्षण में जागरूकता के साथ जीने की कला सिखाता है।”
“ध्यान आपको सिखाता है कि हर परिस्थिति में शांत और स्थिर कैसे रहना है।”

जीवन के लिए स्वामी जी के संदेश
स्वामी जी ने जीवन को सरल और सार्थक बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण संदेश दिए:
वर्तमान में जियो:
“जो बीत गया है, वह केवल एक स्मृति है। जो आने वाला है, वह केवल एक कल्पना है। जीवन केवल इस क्षण में है। इसे पूरी तरह से जीना ही सबसे बड़ा धर्म है।”
जागरूकता को अपनाओ:
“हर कार्य को होशपूर्वक करो। जागरूकता के बिना किया गया हर कार्य बंधन है। जागरूकता के साथ किया गया हर कार्य स्वतंत्रता है।”

ध्यान करो:
“ध्यान के माध्यम से आप अपने भीतर की शांति और आनंद को अनुभव कर सकते हैं। ध्यान वह मार्ग है, जो आपको अपने सत्य स्वरूप तक ले जाता है।”
प्रेम और आनंद को जीवन का आधार बनाओ:
“जीवन का उद्देश्य केवल जीवित रहना नहीं है। इसे प्रेम, आनंद और उत्सव के रूप में जीना चाहिए। यही आध्यात्मिकता है।”
निष्कर्ष:
स्वामी शैलेंद्र सरस्वती जी के साथ हुई इस विशेष बातचीत ने कर्म, ध्यान, और जागरूकता के महत्व को एक नए दृष्टिकोण से स्पष्ट किया। उन्होंने महावीर और ओशो के विचारों को संदर्भित करते हुए बताया कि जीवन का वास्तविक अर्थ वर्तमान में जागरूकता के साथ जीने में है।
कर्म-जाल से मुक्त होने का मार्ग कोई जटिल प्रक्रिया नहीं है। यह केवल जागरूकता और प्रेम के साथ हर क्षण को जीने की साधना है। ध्यान इस साधना का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है, जो आपको अतीत के बंधनों से मुक्त कर, वर्तमान में पूरी तरह से जीवित रहने की कला सिखाता है।
इस तरह की गहरी बातचीत न केवल आध्यात्मिकता की नई परिभाषा देती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि जीवन को कैसे सरल, सार्थक और आनंदमय बनाया जा सकता है। श्री रजनीश ध्यान मंदिर जैसे स्थान, इस दृष्टिकोण को अपनाने और अभ्यास में लाने के लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं।

